रविवार, 24 जुलाई 2011

एक माँ की दुर्लभ अभिलाषा


एक 28 वर्षीय तरूण क्रान्तिकारी को फाँसी की सजा दी गयी । उस क्रान्तिकारी की माँ ने जेल प्रशासन से अपने लाडले पुत्र के अन्तिम संस्कार हेतु शव की मांग की । अत्याचारी निर्दयी अंग्रेजों को डर था कि कहीं जनता क्रान्तिकारी तरूण का शव देखकर भडक नहीं उठे । अतः उस क्रान्तिकारी का शव उस माँ को न सौपने हेतु जेल प्रशासन द्वारा तरह - तरह के तर्क - वितर्क दिये जाते रहे । लेकिन अन्त में उस माँ के तर्को के सामने प्रशासन को झुकना पडा और तरूण के शव को उस माँ को सौपना पडा । माँ अपने तरूण पुत्र का शव लेकर चल पडी , रास्ते में क्रान्तिकारियों के समर्थकों की टोलियाँ आती गयी और काफिला बनता गया । देखते ही देखते कुछ ही समय में शवयात्रा ने एक विशाल जुलूस का रूप धारण कर लिया ।
जब उस क्रान्तिकारी की शव यात्रा मुख्य सडकों से होती हुई उर्दू बाजार पहुँची तो माँ ने आगे आकर कहा - " मेरे लाडले की अर्थी को जरा विश्राम दे दो । तुरन्त एक स्टूल की व्यवस्था करों । "
उपस्थित लोगों में खुसर - पुसर शुरू हुई कि माता जी स्टूल का क्या करेंगी । खैर स्टूल मंगवाया गया । बडे ही गर्व से माता जी स्टूल पर खडी होकर उपस्थित जनसमुदाय को सम्बोधित कर बुलन्द आवाज में कहने लगी ,
" मुझे गर्व है कि मेरे बेटे ने न केवल मेरी कोख की लाज रखी है , बल्कि आप सबको वह रास्ता दिखाया है , जिस पर चलकर आप एक न एक दिन देश को अवश्य आजाद करा लेंगे । मेरे पास देश को देने के लिए और कुछ नहीं है । हाँ , छोटा बेटा है , जिसे मैं जयदेव कपूर को सौपती हूँ और उनसे कहती हूँ कि वे उसे भी ऐसा ही बनायें , जैसा कि उसका बडा भाई था । वह भी अपने बडे भाई के पद चिन्हों पर चलकर दुश्मन गोरों से लोहा लेता हुआ अपना जीवन धन्य करें । वक्त आने पर भाई के समान भारत माता के चरणों में पूजा के पुष्प की तरह समर्पित हो जाए । " माँ बोल रही थी और समस्त जनसमुदाय स्तब्ध श्वांस रोके सुन रहा था ।
" मेरी यही अभिलाषा है । भारत माता की ओजस्वी सन्तानों की , देश हित में बलिदान होने की परम्परा मंद नहीं पड जाये । आपने आज मेरे शहीद पुत्र को जो सम्मान प्रदान किया है , उसके लिए मैं जन - जन की कृतज्ञ हूँ । "
और ऐसा कहकर वह माँ नीचे उतर आयी । शव यात्रा श्मशान घाट की तरफ चल दी । ऐसी दिव्य अभिलाभा रखने वाली वह देवी थी , अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की माँ । विश्व भर के क्रान्ति इतिहास में शायद ही ऐसी माँ की दूसरी मिसाल मिले । सत्ता के दलालों ने ऐसी दिव्य आत्मा के प्रति भी न्याय नहीं किया । वे विस्मृत कर दी गयी । उस दिव्य माँ को हम सबका प्रणाम ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

गांधीजी और ईसाईयत भाग - दो


गतांक से आगे ......
मुझे यह कहते हुए पीडा हो रही है कि कुछ अपवादों को छोडकर आमतौर पर ईसाई प्रचारकों ने सामूहिक रूप से उस शासन - प्रणाली को सक्रिय सहायता पहुँचायी है , जिसने पृथ्वी पर सर्वाधिक सुसंस्कृत तथा सभ्य गिने जाने वाले समाजों को कंगाल बनाया है , हतवीर्य किया है तथा नैतिक दृष्टि से भी गिराया है । भारत में ईसाईयत का अर्थ है भारतीयों को राष्ट्रीयता से रहित बनाना तथा उनका यूरोपीयकरण करना । अगर ईसाई लोग सुधार आन्दोलन में शामिल होना चाहते है तो उन्हें मन में धर्मान्तरण का कोई विचार रखे बिना शामिल होना चाहिए । मुझे कहना पडेगा कि मिशनरियों के कार्यो से मेरे मन को चोट पहुँची है । ईसाई मिशनरी संस्थाओं का तो दावा है कि उनके सारे प्रयासों का एक ही लक्ष्य ' आत्मा का उत्थान ' है परन्तु अपने धर्मावलम्बियों की जमात बढाने की उनकी होड देखकर मेरे मन में बडी चोट पहुँची । मुझे ऐसा लगा कि यह तो धर्म का उपहास है ।
मेरा निश्चित मत है कि अमेरिका और इंग्लैण्ड ने मिशनरी संस्थाओं को जितना पैसा दिया है उससे लाभ की अपेक्षा हानि अधिक हुई है । ' ईश्वर ' और ' धनलोभ ' को एक साथ नहीं साधा जा सकता । मुझे यह आशंका है कि भारत की सेवा करने के लिए धन - पिशाच को ही भेजा गया है , ' गॉड ' पीछे रह गया है । अतः वह एक - न - एक दिन प्रतिशोध अवश्य लेगा । भारत में ईसाईयत अराष्ट्रीयता एवं यूरोपीयकरण का पर्याय बन चुकी है । ईसाई मिशनों ने बच्चों को ईसाई बनाने के उद्देश्य से ही शिक्षा कार्य में रूचि ली है । अपने निजी अनुभवों के आधार पर मेरा यह निश्चित मत है कि आध्यात्मिक चेतना के प्रचार के नाम पर आप पैसे एवं सुविधायें बाटना बंद करें ।
निश्चय ही मैं जीजस का सम्मान करता हूँ परन्तु मैं यह कदापि नहीं मान सकता कि जीजस ' गॉड ' का अवतार या ' गॉड ' के एकमात्र बेटे है । ' बाइबिल के ' न्यू टेस्टामेन्ट ' में स्वयं प्रभु के वचन है ' यह मैं बिल्कुल नहीं मानता ।
मेरा धर्म मुझे ईसाईयों और मुसलमानों की भाँति यह नहीं यह नहीं सिखाता कि दुनिया के सभी लोग उस पर ऐसी ही आस्था रखें जैसी मैं रखता हूँ । मेरा धर्म मुझे ऐसी प्रार्थना सिखाता है कि संसार के सभी लोग अपने - अपने धर्मो एवं पंथों के सर्वोत्कृष्ट स्तर को प्राप्त करने की ओर बढें । इसलिए मैं गीता , महाभारत , रामायण , उपनिषद् एवं भागवत को कभी भी भूलना या खोना नहीं चाहता ।
ईसाईयत उन्नीस सौ वर्ष पुरानी है । इस्लाम तेरह सौ वर्ष पुराना है । मुझे यह कहने में हिचक कभी नहीं रही कि वेद तेरह हजार वर्षो से भी अधिक प्राचीन हैं । सम्भवतः वे दस लाख वर्षो से भी अधिक प्राचीन है क्योंकि वेद ईश्वर - वचन है । इसलिए वेद उतने ही पुरातन है जितने सृष्टि एवं ईश्वर । फिर भी हम विवेक एवं अनुभूति के प्रकाश में ही वेदों की व्याख्या करते हैं । आप लोग ईसाईयत का संदेश देने भारत आये है । कुछ दे पाना तभी सम्भव है जब आप यहाँ से कुछ लें , ग्रहण भी करें । अतः अपना हृदय इस धरती के ज्ञानकोष के लिए खोलें , तभी आप बाईबिल के संदेश को भी यर्थात रूप से समझ सकेंगे । "

( गांधी वांगमय , ' My Experiments With Truth ' एवं हरिजन से संकलित )
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

गांधीजी और ईसाईयत भाग - एक


मोहनदास गांधी जी के पिता श्री करमचन्द गांधी जी एक धार्मिक स्वभाव के जिज्ञासु व्यक्ति थे तथा वह प्रायः सभी धर्मो , मतों और सम्प्रदायों के लोगों से धार्मिक चर्चाएँ किया करते थे जिसका प्रभाव मोहनदास गांधी पर भी पडा ।
अपनी साहित्य में गांधीजी लिखते है - " इन सब चर्चाओं के कारण मुझमें सभी धर्मो के प्रति सहिष्णुता आ गयी , केवल ईसाईयत इसका एक अपवाद रही । उसके प्रति मेरे मन में अरूचि पैदा हो गयी । उन दिनों ईसाई मिशनरी हाईस्कूल के पास एक नुक्कड पर ईसाई लोग खडे हो जाते और हिन्दुओं एवं हिन्दू देवी - देवताओं पर गालियाँ उडेलते हुए अपने पंथ का प्रचार करते । उन्हीं दिनों मैंने सुना कि एक प्रसिद्ध हिन्दू व्यक्ति अपना धर्म बदलकर ईसाई बन गया है । शहर में चर्चा थी कि ' बपतिस्मा ' लेते समय उसे गोमांस खाना पडा , शराब पीनी पडी तथा अपनी वेशभूषा भी बदलनी पडी । वह हैट ( टोपी ) लगाने लगा अर्थात यूरोपियन वेशभूषा धारण करने लगा । मैंने सोचा - ' जो धर्म किसी को गोमांस खाने , शराब पीने और पहनावा बदलने को विवश करे वह धर्म कहे जाने योग्य नहीं है । ' मैंने यह भी सुना कि वह नया धर्मान्तरित व्यक्ति अपने पूर्वजों के धर्म तथा रहन - सहन को गाली देने लगा है । इन सब कारणों से मुझे ईसाईयत के प्रति घृणा हो गयी ।
मैंने ' जेनेसिस ' पढा किन्तु बाद के अध्यायों ने तो मुझे बरबस सुला ही दिया । नाममात्र के लिए बिना कुछ समझे तथा रस लिए मैंने उसके अन्य अध्यायों पर दृष्टि डाली । ' बुक ऑफ नम्बर्स ' तो मुझे बिल्कुल भी पसन्द नहीं आयी । हाँ , ' न्यू टेस्टामेन्ट ' के ' सरमन ऑन द माउण्ट ' में मुझे कहीं ' गीता ' से समानता नजर आयी । यदि कोई सच्चा ईसाई जीवन जीना चाहता है तो उसके लिए ईसाईयत का सार ' सरमन ऑन द माउण्ट ' में है परन्तु वैसी ईसाईयत का आचरण तो आज तक कहीं भी नहीं किया गया ।
इन पुस्तकों का यह तर्क कि - ' जीजस ही ईश्वर के एकमात्र अवतार या ईश्वर और मनुष्य के बीच में एकमात्र मध्यस्थता करने वाले है ' मुझे तनिक भी प्रभावित नहीं कर सका । मैं यह विश्वास कर पाने में असमर्थ था कि जीजस ही ईश्वर के एकमात्र पुत्र है । ' जीजस ईश्वर के इकलौते बेटे थे ' ऐसा कहना तो नास्तिकता है । जीजस के बलिदान की प्रशंसा की जा सकती है परन्तु उस बलिदान में दिव्य और रहस्यमय कुछ भी नहीं है । वह तो कष्ट को सहने का एक दृष्टांतमात्र है । मेरा विवेक इस बात को मानने के लिए भी तैयार नहीं था कि जीजस अपनी मृत्यु एवं रक्त के द्वारा संसार भर के पापों का बोझ अपने ऊपर लेकर सबका प्रायश्चित कर चुके है । मैं यह तनिक भी नहीं मानता कि कोई एक व्यक्ति दूसरे के पापों को धो सकता है , उसे मुक्ति दिला सकता है । ' एक अकेला व्यक्ति जीजस करोडों मनुष्यों के पापों के प्राश्चित के लिए मर गये तथा उनका उद्दार करने वाले हो गये ' यह विचार तो मैं स्वीकार कर ही नहीं सकता ।
मेरी धारणा है कि ईसा मसीह संसार के महान् शिक्षकों में से एक थे । ईसाई मजहब जिस अर्थ में उन्हें संसार का तारणहार समझता है उस अर्थ को मैं नहीं मानता । मैं यह भी नहीं मानता कि संसार भर में केवल ईसा ही देवत्व से विभूषित थे । दो हजार वर्ष पहले कोई व्यक्ति मर गया , उसी को ऐतिहासिक ईश्वर बताना तो विडम्बना है , घोखा है ।
ईसाई मिशनरियाँ जिस प्रकार से इन दिनों ( धर्मान्तरण का ) कार्य कर रही है , उस तरह के काम का कोई भी अवसर उन्हें स्वतंत्र भारत में नहीं दिया जाना चाहिए । ये मिशनरियाँ समस्त भारतवर्ष को नुकसान पहुँचा रही है । मानव परिवार में ऐसी एक चीज का होना एक दुःखद बात है । जब तक आप मिशनरी लोग गैर - ईसाईयों और भारतीयों को अन्धकार में भटकता हुआ मानोगे , तब तक स्वतंत्र भारत में आपके लिए कोई स्थान नहीं होगा । अगर मेरे हाथ में सत्ता हो और मैं कानून बना सकूँ तो तो मैं धर्मान्तरण का यह सारा धन्धा ही बन्द करा दूँ । जिन परिवारों में मिशनरियों की पैठ है उनके खान - पान , रहन - सहन तथा रीति - रिवाज तक में परिवर्तन हो गये है । आज भी हिन्दू धर्म की निन्दा जारी है । ईसाई मिशनों की दुकानों पर मरडॉक की पुस्तके बिकती है । इन पुस्तकों में हिन्दू धर्म की निन्दा के अलावा कुछ भी नहीं है ।
हिन्दू परिवार आप लोगों को अच्छा जीवन बीताने का न्यौता देते है । उसका यह अर्थ नहीं कि आप उन्हें ईसाई धर्म में दीक्षित करें । बडी - बडी समृद्ध ईसाई धर्म प्रचारक संस्थायें भारत की सच्ची सेवा तो तभी कर पायेंगी जब वे अपने मन को इस बात पर राजी कर लें कि - ' अपनी प्रवृत्तियाँ केवल मानव - दया से प्रेरित सेवाकार्य तक ही सीमित रखेंगे । ' सेवा की आड में भारत के भोले - भाले लोगों को ईसाई बनाने का उद्देश्य नहीं रखें । केवल लॉर्ड - लॉर्ड चिल्लाने से कोई ईसाई नहीं हो जायेगा । सच्चा ईसाई वह है जो भगवान के आदेशानुसार आचरण करे और यह कार्य एक ऐसा व्यक्ति भी कर सकता है जिसने कभी जीजस का नाम भी नहीं सुना हो ।
क्रमश ......

( गांधी वांगमय , ' My Experiments With Truth ' एवं हरिजन से संकलित )
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

शिकागो धर्मसंसद में स्वामी विवेकानन्द का ऐतिहासिक भाषण


अमेरिकावासी बहनों और भाइयों ,
आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है , उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खडा होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है । संसार में सन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ , धर्मो की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि - कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ । मैं इस मंच पर बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बताया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रसारित करने के गौरव का दावा कर सकते है ।
मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है । हम लोग सब धर्मो के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन् समस्त धर्मो को सच्चा मानकर स्वीकार करते है । मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मो और देशों के उत्पीडितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है । मुझे आपको यह बताते हुये गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था , जिन्होंने दक्षिण भारत जाकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था । ऐसे धर्म का अनुयायी होने मे मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुस्त जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहे है । भाइयों , मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं अपने बचपन से करता रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं -
रूचीता वैचित्र्यादृजुकटिल नाना पथजुषाम् ।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णक इव ।।
जैसे विभिन्न भिन्न - भिन्न स्रोतों से होकर समुन्द्र में मिल जाती है , उसी प्रकार हे प्रभु ! भिन्न रूचि के अनुसार विभिन्न टेडे - मेढे अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते है । यह सभा जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत् के प्रति उसकी घोषणा है -
ये यथा मां प्रपद्यते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मनुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।।
जो कोई मेरी ओर आता है चाहे वह किसी भी प्रकार से हो मैं उसको प्राप्त होता हूँ लोग भिन्न - भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुये अन्त में मेरी ही ओर आते है ।
साम्प्रदायिकता , हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है । वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है , उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही है , सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है । यदि ये वीभत्स दानवी नहीं होती , तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अन्नत हो गया होता । पर अब उनका समय आ गया है और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है , वह समस्त धर्मान्धता का , तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीडनों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं का मृत्यु - निनाद सिद्ध हो ।

बुधवार, 20 जुलाई 2011

महान गणितज्ञ गोस्वामी तुसलीदास


महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी को गणितज्ञ कहा जाना थोडा अटपटा लगना स्वभाविक है लेकिन तुलसीदास के साहित्य में गणित और ज्योतिष का प्रयोग देखकर हमें तुलसीदास को गणितज्ञ तो मानना ही पडेगा । तुलसीदास की प्रसिद्ध रचना ' हनुमान चालिसा ' की पंक्ति - ' जुग सहस्त्र योजन पर भानू ...... ' हमें उनके ज्ञान के बारे में एक नये दृष्टिकोण से सोचने पर विवश करती है , इस पंक्ति में उन्होंने सूर्य को पृथ्वी से युग ( जुग ) सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित बताया हैं । जब इसके आधार पर वैदिक गणित के अनुसार गणना की जाती है तो पृथ्वी से सूर्य की दूरी का सही मान निकल कर आता है । सर्वप्रथम युग , सहस्त्र और योजन इन पदों के मान देखें ।
* युग - साधारणतः युग शब्द चार के अर्थ में प्रयुक्त होता है । किन्तु यहाँ युग तथा उसका मान दिव्य वर्षो एवं सौर वर्षो में क्या होता है साथ ही चार युग अर्थात चतुर्युग का मान वर्षो में कितना है , यह ज्ञात देखेगे ।
सतयुग दिव्य वर्षो में 4800 वर्ष तथा सौर वर्षो में 1728000 वर्ष
त्रेतायुग दिव्य वर्षो में 3600 वर्ष तथा सौर वर्षो में 1296000 वर्ष
द्वापरयुग दिव्य वर्षो में 2400 वर्ष तथा सौर वर्षो में 864000 वर्ष
कलियुग दिव्य वर्षो में 1200 वर्ष तथा सौर वर्षो में 432000 वर्ष ।
चतुर्युग का मान सौर वर्षो में अधिकांश व्यक्ति जानते है किन्तु चतुर्युग का मान दिव्य वर्षो में 12000 है और यह वैदिक काल गणना का एक मुख्य आधार है ।
* सहस्त्र - सहस्त्र अर्थात हजार , गणना करने में सहस्त्र का मान एक हजार रखते है ।
* योजन - 1 योजन = 8 मील , 1 मील = 1.6 कि.मी. ( लगभग )
जब तीन पदों क्रमशः युग , सहस्त्र और योजन का मान रखकर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा दिये गये सूत्र से पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी की गणना की जाती है तो -
युग सहस्त्र योजन पर भानू = 12000x 1000x8 = 9,60,00,000 = 9,60,00,000x1.6 कि.मी. = 15,36,00,000 कि.मी.
पन्द्रह करोड छत्तीस लाख किलोमीटर पृथ्वी से सूर्य की दूरी निकल कर आती है । यह मान गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ' जुग सहस्त्र योजन पर भानू ...... ' से ज्ञात होता है । वर्तमान की गणना के आधार पर भी हम जानते है कि पृथ्वी की दूरी 150000000 ( पन्द्रह करोड ) किलोमीटर लगभग है । यह सुखद आश्चर्य है कि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा दिया गया पृथ्वी से सूर्य की दूरी का मान , वर्तमान गणना के लगभग निकट है । अब तो मानना ही पडेगा कि गोस्वामी तुलसीदास महान गणितज्ञ भी थे ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

अपना उद्धार स्वयं करें


अपने उद्धार और पतन में मनुष्य स्वयं कारण है , दूसरा कोई नहीं । परमात्मा ने मनुष्य शरीर दिया है तो अपना उद्धार करने के साधन भी पूरे दिये है । इसलिए अपने उद्धार के लिए दूसरे पर आश्रित होने की आवश्यकता नहीं है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट कहा है कि - अपने द्वारा अपना उद्धार करें , अपना पतन न करें । क्योंकि आप ही अपने मित्र है और आप ही अपने शत्रु है ।
इस बात में कोई संदेह नहीं कि दिव्यभूमि भारतवर्ष में ऐसे असाधारण गुरू आज भी मौजूद है जो लोगों की बेचैनी , व्याकुलता और कुंठा का समाधान साधारण तरीके से करने की क्षमता रखते है । साथ ही ये आध्यात्मिक गुरू लोगों के जीवन को कठिन बनाने वाली चुनौतियों का समाधान भी कर रहे है ।
शिष्य को गुरू की जितनी आवश्यकता रहती है , उससे अधिक आवश्यकता गुरू को शिष्य की रहती है । जिसके भीतर अपने उद्धार की लगन होती है जो अपना कल्याण करना चाहते है तो उसमें बाधा कौन दे सकता है ? और अगर आप अपना उद्धार नहीं करना चाहते तो आपका उद्धार कौन कर सकता है । कितने ही अच्छे गुरू हों , सन्त हों पर आपकी इच्छा के बिना कोई आपका उद्धार नहीं कर सकता ।
गुरू , सन्त और भगवान भी तभी उद्धार करते हैं , जब मनुष्य स्वयं उन पर श्रद्धा - विश्वास करता है , उनको स्वीकार करता है , उनके सम्मुख होता है , उनकी देशनाओं का पालन करता है । अगर मनुष्य उनको स्वीकार न करें तो वे कैसे उद्धार करेंगे ? नहीं कर सकते । स्वयं शिष्य न बने तो गुरू क्या करेगा ? जैसे दूसरा कोई व्यक्ति भोजन तो दे देगा , पर भूख स्वयं को चाहिए । स्वयं को भूख न हो तो दूसरे के द्वारा दिया गया बढिया भोजन भी किस काम का ? ऐसी ही स्वयं में लगन न हो तो गुरू का , सन्त - महात्माओं का उपदेश किस काम का ?
भारत भूमि में गुरू , सन्त और भगवान का कभी अभाव नहीं होता । अनेक सुविख्यात सन्त हो गये , आचार्य हो गये , गुरू हो गये पर अभी तक हमारा उद्धार नहीं हुआ है । इससे सिद्ध होता है कि हमने उनको स्वीकार नहीं किया । अतः अपने उद्धार और अपने पतन में हम ही कारण है । जो अपने उद्धार और पतन में दूसरे को कारण मानता है , उसका उद्धार कभी हो ही नहीं सकता । वास्तव में मनुष्य स्वयं ही अपना गुरू है । इसलिए उपदेश स्वयं को ही दें । दूसरे में कमी न देखकर अपने में ही कमी देखें और उसे दूर करने की चेष्टा करें । तात्पर्य यह है कि वास्तव में कल्याण न गुरू से होता है और न ईश्वर से ही होता है , प्रत्युत हमारी सच्ची लगन से होता है । स्वयं की लगन के बिना तो भगवान भी कल्याण नहीं कर सकते ।
गुरू बनाने से अधिक महत्वपूर्ण है गुरू की देशनाओं पर चलना । यदि गुरू बनाने मात्र से कल्याण हो जाता तो दत्तात्रेय 17 गुरू न बनाते । स्वामी रामतीर्थ ने तो यहां तक कह डाला कि न तो राम तुम्हारा कल्याण कर सकते है न ही कृष्ण । तुम्हें अपना रास्ता स्वयं चुनना होगा और उस पर चलना होगा ।
गुरू की महिमा कौन नहीं जानता ? इसमें कोई संदेह नहीं कि गुरू का समय - समय पर दिशा - निर्देश पाते रहना चाहिए । गुरू तो हमें अध्यात्म का मार्ग दिखाता है , अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है । हमें सत्य के मार्ग पर चलने तथा मानसिक विकारों से मुक्ति की युक्ति बताता है । वह हमारा मददगार है । हम उसका सम्मान करें । हम उसको नमन करें । उनके प्रति कृतज्ञ रहें । जहां तक परमात्मा का स्थान है उसे कोई नहीं ले सकता ।
स्वामी सत्यमित्रानंद जी कहते है कि मैं तो तुम्हारी तरह साधक हूँ । आपका विश्वास ही आपकी प्राप्ति है । ऐसे सच्चे महापुरूषों का , सद्गुरूओं का सान्निध्य मिल जाये तो साधक भाग्यशाली है । याद रखों आपका उद्धार गुरू के अधीन है , न सन्त - महात्माओं के अधीन है और न भगवान के अधीन है । अपना उद्धार तो स्वयं के ही अधीन है ।
आज गुरूपूर्णिमा का महापर्व है , गुरू की देशनाओं को जीवन में उतारने का संकल्प लेने का दिन है । सभी को गुरूपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

रविवार, 10 जुलाई 2011

श्रीकृष्ण और कम्युनिस्ट


ईस्वी सन 1941 की बात है । स्वाधीनता संग्राम सेनानी रघुकुल तिलक तथा विख्यात शायर सज्जाद जहीर आदि अनेक व्यक्ति लखनऊ की जेल में सजा काट रहे थे । श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात को डॉ. जवाहर लाल रस्तोगी व बाबा रामचन्द्र ने फूलों की डोली बनाई । उसमें श्रीकृष्ण की मूर्ति रखी गई । गीता का अखण्ड पाठ हुआ । रघुनाथ तिलक ने अचानक सच्जाद जहीर की ओर संकेत करते हुए कहा , ' ये विचारधारा से कम्युनिस्ट हैं । विख्यात लेखक भी हैं । अतः आज इन्हीं के मुख से कृष्ण लीलाओं पर कुछ सुनिएगा । '
सज्जाद जहीर मुस्कराए व सूरदास के कुछ पद सुनाने के बाद बोले , ' मुझे श्रीकृष्ण के जीवन का वह प्रसंग बहुत पसंद है , जब उन्होंने दूध , दही तथा घी ब्रज के गांवों से बाहर ले जाने का विरोध करते हुए क्रान्तिकारी स्वरूप का प्रदर्शन कर मटकियां फोडी थी । मैं कृष्ण के उस रूप का भी कायल हूँ , जब वह साधारण परिवार में जन्मे गोप - बालकों के साथ खाते - पीते थे , समता का संदेश देते थे । ' एक घोर कम्युनिस्ट नेता से श्रीकृष्ण का गुणगान सुनकर लोग बहुत प्रसन्न हुए ।