एक 28 वर्षीय तरूण क्रान्तिकारी को फाँसी की सजा दी गयी । उस क्रान्तिकारी की माँ ने जेल प्रशासन से अपने लाडले पुत्र के अन्तिम संस्कार हेतु शव की मांग की । अत्याचारी निर्दयी अंग्रेजों को डर था कि कहीं जनता क्रान्तिकारी तरूण का शव देखकर भडक नहीं उठे । अतः उस क्रान्तिकारी का शव उस माँ को न सौपने हेतु जेल प्रशासन द्वारा तरह - तरह के तर्क - वितर्क दिये जाते रहे । लेकिन अन्त में उस माँ के तर्को के सामने प्रशासन को झुकना पडा और तरूण के शव को उस माँ को सौपना पडा । माँ अपने तरूण पुत्र का शव लेकर चल पडी , रास्ते में क्रान्तिकारियों के समर्थकों की टोलियाँ आती गयी और काफिला बनता गया । देखते ही देखते कुछ ही समय में शवयात्रा ने एक विशाल जुलूस का रूप धारण कर लिया ।
जब उस क्रान्तिकारी की शव यात्रा मुख्य सडकों से होती हुई उर्दू बाजार पहुँची तो माँ ने आगे आकर कहा - " मेरे लाडले की अर्थी को जरा विश्राम दे दो । तुरन्त एक स्टूल की व्यवस्था करों । "
उपस्थित लोगों में खुसर - पुसर शुरू हुई कि माता जी स्टूल का क्या करेंगी । खैर स्टूल मंगवाया गया । बडे ही गर्व से माता जी स्टूल पर खडी होकर उपस्थित जनसमुदाय को सम्बोधित कर बुलन्द आवाज में कहने लगी ,
" मुझे गर्व है कि मेरे बेटे ने न केवल मेरी कोख की लाज रखी है , बल्कि आप सबको वह रास्ता दिखाया है , जिस पर चलकर आप एक न एक दिन देश को अवश्य आजाद करा लेंगे । मेरे पास देश को देने के लिए और कुछ नहीं है । हाँ , छोटा बेटा है , जिसे मैं जयदेव कपूर को सौपती हूँ और उनसे कहती हूँ कि वे उसे भी ऐसा ही बनायें , जैसा कि उसका बडा भाई था । वह भी अपने बडे भाई के पद चिन्हों पर चलकर दुश्मन गोरों से लोहा लेता हुआ अपना जीवन धन्य करें । वक्त आने पर भाई के समान भारत माता के चरणों में पूजा के पुष्प की तरह समर्पित हो जाए । " माँ बोल रही थी और समस्त जनसमुदाय स्तब्ध श्वांस रोके सुन रहा था ।
" मेरी यही अभिलाषा है । भारत माता की ओजस्वी सन्तानों की , देश हित में बलिदान होने की परम्परा मंद नहीं पड जाये । आपने आज मेरे शहीद पुत्र को जो सम्मान प्रदान किया है , उसके लिए मैं जन - जन की कृतज्ञ हूँ । "
और ऐसा कहकर वह माँ नीचे उतर आयी । शव यात्रा श्मशान घाट की तरफ चल दी । ऐसी दिव्य अभिलाभा रखने वाली वह देवी थी , अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की माँ । विश्व भर के क्रान्ति इतिहास में शायद ही ऐसी माँ की दूसरी मिसाल मिले । सत्ता के दलालों ने ऐसी दिव्य आत्मा के प्रति भी न्याय नहीं किया । वे विस्मृत कर दी गयी । उस दिव्य माँ को हम सबका प्रणाम ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '