रविवार, 13 नवंबर 2011

बाल दिवस : मेरे देश के बच्चों के आदर्श नहीं हो सकते नेहरू ?




ये है सच जवाहर लाल नेहरू का जो अपनी बेटी समान लड़कियों को भी अपनी अय्याशी का साधन समझता रहा । इसके जैसे निर्लज्ज अय्याश पुरूष को मैं क्या बच्चे भी स्वीकारने को तैयार नहीं कि इसे चाचा कहा जाये ।
जब स्वतंत्रता के संघर्ष में सत्ता का हस्तांतरण हुआ तो सारा श्रेय कांग्रेस को मिला । प्रधानमंत्री पद के चुनाव में कुल 15 वोटों में से 14 वोट सरदार पटेल के पक्ष में और 1 वोट नेहरू के पक्ष में पड़ने के बाद भी नेहरू गांधी जी की कृपा से देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने । लेकिन 1955 में " ओह दैट आफुल ओल्ड हिपोक्रेट " Oh, that awful old hypocrite - ओह ! वह ( गांधी ) भयंकर ढोंगी बुड्ढा कहकर नेहरू ने अपने प्रति किये गये गांधी के महान त्याग को अपमानित कर दिया ।
विदेश में पढ़ा एक व्यक्ति जो भारत की सनातन संस्कृति से अनजान था । जो अपने को हिन्दू कहलाने में अपमान समझता था । जो पराई स्त्री के चक्कर में इतना गिर सकता है कि जिसका कोई चरित्र ही नहीं हो , जो उन्मुक्त रूप से एक औरत के साथ सिगरेट पीता दिखाई देता है । ऐसे व्यक्ति के जन्मदिन को अगर हमारी सरकार बाल दिवस के रूप में मनाती है , विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्यक्रम करती है और कहती है इसने प्रेरणा ले ? अगर हमारे देश की आने वाली पीढ़ी इसके पद चिन्हों पर चलने लगे तो भारत का भविष्य अंधकारमय होगा ।
आज देश में जो आतंकवाद , संप्रदायवाद की समस्या है । कश्मीर की समस्या , राष्ट्र भाषा हिन्दी की समस्या और चीन तथा पाकिस्तान द्वारा भारत की भूमि पर अतिक्रमण की समस्या है । इन सभी समस्याओं के मुख्य उत्तरदायी जवाहर लाल नेहरू है , जिन्हें भारत सरकार चाचा नेहरू कहती है ?
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

एको ॐकार सतिनामु ...


रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रवणः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरूषं नृषु ।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते है ' हे अर्जुन ! जल में रस मैं हूँ । चन्द्रमा तथा सूर्य में प्रकाश मैं हूँ । संपूर्ण वेदों में ॐकार मैं हूँ । आकाश में शब्द और पुरूषों में पुरूषत्व मैं हूँ । '
( श्रीमद्भगवद्गीता : 7.8 )
किसी भी जाति का , किसी भी देश , मत या संप्रदाय का बालक हो , जब वह पैदा होता है तब पहली ध्वनि ' ॐ ... आ ... ॐ ... आ ... ' कहाँ से आती है ? उसकी ध्वनि इसी ॐकार से मिलती है । ॐ अनहद्नाद है , परम संगीत है , सृष्टि के सभी स्वर इसमें पिरोए गये है । इसी से उनका जन्म हुआ है , इसी से उनको जीवन मिलता है और इसी में उन्हें लय होना है । ॐ सृष्टि की सभी ऊर्जाओं का परमस्रोत है । ॐ ध्यान बीज है । इसके सुदीर्घ ध्यान से सृष्टि के सभी रहस्य उजागर हो जाते है । ॐ के नाद का , ध्वनि का महत्व केवल सनातन धर्म या वैदिकों में ही नहीं बल्कि जैन , बौद्ध , सिक्ख आदि सभी में है । ईसाइयों का ' आमेन ' और इस्लाम का ' आमीन ' भी ॐ का ही रूप है ।
ॐ शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है । अ + उ + म् = ओम् । ॐ का ' अ ' कार स्थूल जगत का आधार है । ' उ ' कार सूक्ष्म जगत का आधार है । ' म् ' कार कारक जगत का आधार है । जो इन तीनो जगत से प्रभावित नहीं होता बल्कि तीनों जगत जिससे सत्ता - सफूर्ति लेते है फिर भी जिसमें तिलभर भी फर्क नहीं पड़ता , उस परमात्मा का द्योतक ॐ है ।
ॐ आत्मिक बल देता है । ॐ के उच्चारण से जीवनशक्ति ऊर्ध्वगामी है । इसके सात बार के उच्चारण से शरीर के रोग के कीटाणु दूर होने लगते है तथा चित्त से हताशा - निराशा भी दूर होती है । यही कारण है कि प्राचीन ऋर्षि - मुनि , वैज्ञानिकों ने सभी मन्त्रों के आगे ॐ जोड़ा है ।
एक बार सद्गुरू नानक नदी में गये और तीन दिन तक डूबे रहे , खो गये । फिर बाहर आये । वे बाहर की सरिता में सरिता में नहीं , वरन् अन्तर्मुखी वृत्तियों की सरिता में खो गये थे । नानकजी ध्यानमग्न हो गये थे । वे तीन दिन तक अन्तरात्मा के ध्यान में डूबे थे और तीन दिन बाद जब जगे , तब उनका पहला वचन था : एको ॐकार ... परमात्मा एक है ।
एको ॐकार सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरू ।
अकाल मूरति अजूनि सैभं गुरू प्रसादी ।।
आदि सचु जुगादि सचु ।
है भी सचु नानक होसी भी सचु ।।
एको ॐकार : परमात्मा एक है ।
सतिनामु : वही सत् है ।
करता पुरखु : वही प्रकृति को सत्ता देता है ।
निरभउ : वह निर्भय है ।
निरवैरू : उसका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है ।
अकाल मूर्ति : वहाँ काल की गति नहीं है । काल संसार की सब वस्तुओं को खा जाता है , निगल जाता है , आकृतियों को नष्ट कर देता है लेकिन वह परमात्मा आकृति से परे है , निराकार सत्ता है ।
अजूनि : वह योनि में नहीं आता अर्थात अजन्मा है ।
सैभं : वह स्वयंभू है ।
गुर प्रसादि : उस परमात्मतत्व का जिन्होंने अनुभव किया हो ऐसे गुरूओं की जब कृपा बरसती है तब प्रसादरूप में वह मिलता है । आत्मतत्व की अनुभूति के रूप में वह मिलता है ।
आदि सचु जुगादि सचु : जो आदि में सत् था , जो युगों से सत् था ... युग बदल गये , समय बदल गया , परिस्थितियाँ बदल गई , मनुष्य बदल गये , मनुष्य के मन , बुद्धि , विचार बदल गये फिर भी वह नहीं बदला ।
है भी सचु नानक ! होसी भी सचु : जो युगों से सत् था , अभी - भी सत् है और बाद में भी सत् रहेगा , उसी को नानक ने एको ॐकार सतिनामु ... कहा है । उस अकाल पुरूष को जानने पर मनुष्य को कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता ।
ॐ का पहला अक्षर ' अ ' नाभि में कम्पन करता है , दूसरा अक्षर ' उ ' हृदय में कम्पन करता है और तीसरा अक्षर ' म् ' दोनों भोहों के मध्य आज्ञाचक्र में कम्पन करता है । ओम् ध्वनि के उच्चारण करने से समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ , कर्मेन्द्रियाँ और मन एकाग्र व अर्न्तमुखी हो जाता है तथा प्रसुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती है । ॐ ध्वनि का दीर्घकालिक अभ्यास समाधि के दिव्य नाद को भी प्राप्त करा देता है ।
सद्गुरू नानकदेव ज्यन्ति कार्तिक पूर्णिमा की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ ।
ॐ लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

बुधवार, 9 नवंबर 2011

मेडिकल साइंस की नई आशा ॐ


ॐ ब्रह्मांड के निर्माण का रहस्य , परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग और अब विज्ञान जगत की नई आशा । हमारे सनातन वेद , उपनिषद् आदि शास्त्रों में ॐ का विशेष महत्व एवं उसकी मन्त्र शक्ति का उल्लेख किया गया है । वैदिक ऋचाओं से निकले ॐ में अब मेडिकल साइंस उन बीमारियों का इलाज खोज रही है जिनसे दवाएँ हार गई है ।
विश्व के अनेक वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि ॐ के उच्चारण मात्र से अनेक रोगों की चिकित्सा संभव है । प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका ' साइंस ' में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि ॐ एक ऐसा शब्द है जिसका अलग - अलग आवृत्तियों में जाप हृदय , मस्तिष्क , पेट और रक्त से जुड़ी कई बीमारियों के इलाज में चमत्कारी असर दिखा सकता है । यहाँ तक कि सेरीब्रल पैल्सी जैसी असाध्य बीमारी में भी इसके सकारात्मक प्रभाव देखने में आये है ।
पत्रिका में रिसर्च एंड एक्सपेरिमेंटल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइंसेज की एक टीम का शोध प्रकाशित किया गया है । टीम के प्रमुख प्रोफेसर जे. मॉर्गन के अनुसार उनकी टीम ने सात वर्ष तक हृदय और मस्तिष्क के रोगियों पर परीक्षण किया है । परीक्षण के दौरान देखा गया कि ॐ का अलग - अलग आवृत्तियों और ध्वनियों में नियमित जाप काफी प्रभावशाली है । ॐ का उच्चारण पेट , हृदय और मस्तिष्क में एक कंपन पैदा करता है । देखा गया कि यह कंपन शरीर की मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवन देता है और नई कोशिकाओं का निर्माण भी करता है । यह जाप मस्तिष्क से लेकर नाक , गला , फेफड़े तक के हिस्से में बड़ी तेज तरंगों का वैज्ञानिक रूप से संतुलित संचार करता है ।
प्रो. मॉर्गन ने बताया कि परीक्षण के लिए मस्तिष्क और हृदय के विभिन्न रोगों से ग्रस्त 2500 पुरूषों और 2000 स्त्रियों को चुना गया । इनमें से कुछ लोग बीमारी के अंतिम चरण में पहुँच चुके थे । प्रो. मॉर्गन की टीम ने धीरे - धीरे इन लोगों को मिलने वाली बाकी दवाइयाँ बंद कर सिर्फ वही दवाएँ जारी रखीं जो जीवन बचाने के लिए आवश्यक थी । डॉक्टरी निरीक्षण में इन लोगों ने प्रतिदिन सुबह छह से सात बजे तक एक घंटे तक विभिन्न आवृत्तियों में ॐ का जाप किया । इसके लिए योग्य प्रशिक्षक रखे गए थे । हर तीन माह पर इन लोगों का शारीरिक परीक्षण करवाया गया । चार वर्ष बाद सामने आए परिणाम चौंकाने वाले थे । 70 प्रतिशत पुरूष और 85 प्रतिशत स्त्रियों को 90 प्रतिशत फायदा मिला । कुछ लोगों पर इसका प्रभाव 10 प्रतिशत ही हुआ । लेकिन प्रो. मॉर्गन ने इसका कारण रोग का अन्तिम अवस्था में पहुँचना बताया ।
अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान द्वारा किये गये एक रिसर्च के अनुसार ॐ के उच्चारण से इंटरनल , ऑटोनोमिक नर्व्स पर प्रभाव पडता है और दोनों की गतिविधियाँ कम हो जाती है । जिससे लोग शान्ति अनुभव करने लगते है । एंग्जाइटी , डिप्रेशन व रक्तचाप ठीक हो जाता है । ॐ के उच्चारण से नाभि से लेकर मस्तिष्क तक धमनियाँ सामान्य होने लगती है । इससे रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है , जिससे ॐ का प्रभाव नकारा नहीं जा सकता ।
ॐ को उच्चारण की दृष्टि से तीन स्वरों अ , उ एवं म् के रू में स्पष्ट किया जाता है । ' अ ' सृष्टि के उद्भव का , ' उ ' सृष्टि के विस्तार का तथा ' म् ' सृष्टि के समाहार का प्रतिक है । ' अ ' शब्द के उच्चारण से ओज एवं शक्ति का विकास होता है । ' उ ' शब्द के उच्चारण से यकृत , पेट एवं आंतों पर अच्छा प्रभाव पडता है । ' म ' शब्द के उच्चारण से मानसिक शक्ति विकसित होती है । विभिन्न मनोदैहिक रोगों के उपचार में ॐ ( ओम् ) मन्त्र की सफलता असंदिग्ध है । असाध्य मानसिक रोगों में भी इस मन्त्र से आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त किये जा सकते है । तनाव , अवसाद जैसे मनोरोगों से पीडित मनुष्य के लिए यह मन्त्र किसी औषधि से कम नहीं है । ॐ जाप स्नायुओं की दुर्बलता , हृदय रोग , उच्च व निम्न रक्तचाप , मधुमेह जैसे रोगों में भी लाभदायक है । ओम् मन्त्र के नियमित जाप से हृदय की शुद्धि होती है तथा मानसिक शक्ति प्रखर होती है ।
ॐ का प्रयोग करें और लाभ उठाएँ : -
आप स्वयं भी ॐ के चमत्कारी लाभों से फायदा उठा सकते है । प्रतिदिन प्रातः और रात्रि सोते समय ओम् का जाप पाँच - दस मिनट तक करें और फिर कुछ देर बिना बोले ( मानसिक ) जाप करें । कुछ ही दिनों में आप देखेंगे कि आप के सारे के सारे शारीरिक और मानसिक रोग ठीक होते जा रहे है । बुद्धि , स्मरणशक्ति , शक्ति , उत्साह तथा प्रसन्नता आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती ही जायेगी ।
ॐ लोका समस्ता सुखिनो भवन्तुः ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

रविवार, 6 नवंबर 2011

त्याग एवं गौ पूजा के पवित्र पर्व बकर ईद ( ईद - उल - जुहा ) के अवसर पर एक अनुरोध :- अल्लाह के नाम पर पशु - बलि जैसा महापाप क्यों ?

बकर ईद ( ईद - उल - जुहा ) त्याग और गौ पूजा का महान पर्व है , जो त्याग के महिमावर्द्धन और गौ वंश के संरक्षण के लिए मनाया जाता है । त्याग की प्रेरणा के लिए हजरत इब्राहीम के महान त्याग को याद किया जाता है और गौ पूजा के लिए प्राचीन अरबी समाज की समृद्ध वैदिक संस्कृति को । बकरीद अर्थात बकर + ईद , अरबी में गाय को बकर कहा जाता है , ईद का अर्थ पूजा होता है । जिस पवित्र दिन गाय की सेवा करके पुण्य प्राप्त किया जाना चाहिए , उस दिन ईद की कुर्बानी देने के नाम पर विश्वभर में लाखों निर्दोष बकरों , बैलों , भैसों , ऊँटों आदि पशुओं की गर्दनों पर अल्लाह के नाम पर तलवार चला दी जाएगी , वे सब बेकसूर पशु धर्म के नाम पर कत्ल कर दिए जायेगे ।
कुर्बानी की यह कुप्रथा हजरत इब्राहीम से सम्बंधित है । इस्लामी विश्वास के अनुसार हजरत इब्राहीम की परीक्षा लेने के लिए स्वयं अल्लाह ने उनसे त्याग - कुर्बानी चाही थी । हजरत इब्राहीम ज्ञानी और विवेकवान महापुरूष थे । उनमें जरा भी विषय - वासना आदि दुर्गुण नहीं थे , जब दुर्गुण ही नहीं थे तो त्यागते क्या ? उन्हें मजहब प्रचार के हेतु से पुत्र मोह था , अतः उन्होंने उसी का त्याग करने का निश्चय किया । मक्का के नजदीक मीना के पहाड़ पर अपने प्रिय पुत्र इस्माईल को बलि - वेदी पर चढाने से पहले उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली । जब बलि देने के बाद पट्टी हटाई तो उन्होंने अपने पुत्र को अपने सामने खड़ा देखा । वेदी पर कटा हुआ मेमना पड़ा हुआ था ।
त्याग के इस महान पर्व को धर्म के मर्म से अनजान स्वार्थी मनुष्यों ने आज पशु - हत्या का पर्व बना दिया है । लगता है कि आज के मुस्लिम समाज को भी अल्लाह पर विश्वास नहीं है तभी तो वे अपने पुत्रों की कुर्बानी नहीं देते बल्कि एक निर्दोष पशु की हत्या के दोषी बनते है । यदि बलि देनी है तो बलि विषय वासनाओं , इच्छाओं और मोह आदि दुर्गुणों की दी जानी चाहिए , निर्दोष निरीह पशुओं की नहीं । पशु बलि न तो इस्लाम के अनिर्वाय स्तम्भों में से एक है और न ही मुसलमानों के लिए अनिवार्य कही गयी है । पशु हत्या के बिना भी एक पक्का मुसलमान बना जा सकता है । इस्लाम का अर्थ शान्ति है तो ईद के अवसर पर निर्दोष पशुओं की हत्या का चीत्कार क्यों ?
जब एक पशु किसी मनुष्य को मारता है तो सभी लोग उसको दरिंदा कहते है , और जब एक मनुष्य किसी पशु को मारकर या मरवाकर उसकी लाश को मांस के नाम से खाता है तो आधुनिक बुद्धिजीवी मनुष्य उसको दरिंदा न कहकर मांसाहारी कहते है । क्या मांस किसी पशु की हत्या किए बिना प्राप्त हो जाता है ? अल्लाह के नाम पर , धर्म के नाम पर पशु बलि व मांसाहार की दरिंदगी को छोड़कर स्वस्थ और सुखद शाकाहारी जीवन अपनाओं ।
शाकाहार विश्व को भूखमरी से बचा सकता है । आज विश्व की तेजी से बढ़ रही जनसंख्या के सामने खाद्यान्न की बड़ी समस्या है । एक कैलोरी मांस को तैयार करने में दस कैलोरी के बराबर शाकाहार की खपत हो जाती है । यदि सारा विश्व मांसाहार को छोड़ दे तो पृथ्वी के सीमित संसाधनों का उपयोग अच्छी प्रकार से हो सकता है और कोई भी मनुष्य भूखा नहीं रहेगा क्योंकि दस गुणा मनुष्यों को भोजन प्राप्त हो सकेंगा । कुर्बानी की रस्म अदायगी के लिए सोयाबीन अथवा खजूर आदि का उपयोग किया जा सकता है ।
बकर ईद के अवसर पर गौ आदि पशुओं के संरक्षण का संकल्प लिया जाना चाहिए । हदीस जद - अल - माद में इब्न कार्य्यम ने कहा है कि " गाय के दूध - घी का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि यह सेहत के लिए फायदेमंद है और गाय का मांस सेहत के लिए नुकसानदायक है । "
ईश्वर पशु - हत्यारों को सद्बुद्धि प्रदान करे और वे त्याग एवं गौ पूजा के इस पवित्र पर्व बकर ईद के तत्व को समझकर शाकाहारी और सह - अस्तित्व का जीवन जीने का संकल्प लें , हार्दिक शुभकामनाएँ ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

तेरह साल की क्रांतिकारी मैना

सन् 1857 के स्वतंत्रता समर की आग भड़क उठी थी । मेरठ , कानपुर और दिल्ली इसके प्रमुख केन्द्र थे । कानपुर की क्रांति का नेतृत्व नाना साहब पेशवा कर रहे थे । इस क्रांति को कुचलने के लिए अंग्रेजी सरकार देशभक्तों को पकड़ने और नष्ट करने लगी । ऐसी विषम स्थिति में नानाजी को अन्य स्थानों से बुलावा आया तो उनका बिठूर ( कानपुर ) छोड़कर जाना आवश्यक हो गया तो उन्होंने कानपुर की क्रांति की बागडोर अपनी तेरह वर्ष की वीर पुत्री " मैना " को सौप दी ।
क्रांतिकारियों और अंग्रजी सेनाओं में जगह - जगह युद्ध होने लगे , जिनमें मैना ने भी बढ़ - चढ़कर भाग लिया और अपनी वीरता का परिचय दिया । युद्ध भूमि में अंग्रेजी सेना के घेरे में फँसे तात्या टोपे को बचाने के लिए वह अंग्रेज सेना पर टूट पड़ी । अचानक हुए इस हमले से अंग्रेज घबरा गये और उधर तात्या को भागने का मौका मिल गया । साहसी मैना दूर तक शत्रुओं का पीछा करती रही । यह युद्ध कई घण्टे चला । वह अंग्रेजों को चकमा देकर युद्ध भूमि से निकल गई और गंगा नदी के तट पर तात्या टोपे के साथ आगे की योजना बनाने लगी कि तभी घोड़े पर सवार अंग्रेज सेना की टुकड़ी आ धमकी । तात्या टोपे तो नदी को पार कर निकल गये परन्तु मैना घिर गई । मैना तुरन्त तलवार निकाल कर अंग्रेज सेना के साथ वीरतापूर्ण युद्ध करने लगी । दुर्भाग्य से उनके हाथ से तलवार गिर गई और शत्रुओं ने उन्हें पकड़कर बंदी बना लिया और फिर उन्हें सेनापति के सामने पेश किया गया । सेनापति कुछ देर तक मैना को देखता रहा फिर उसने डांटकर उनसे उनका परिचय पूछा तो मैना ने कहां कि मैं वीर सैनानी नाना साहब पेशवा की बेटी हूँ , मेरा नाम मैना है । यह सुनकर सेनापति कुटिलतापूर्वक बोला , ' तुम नाना की बेटी हो जो हमारा कट्टर शत्रु है , तुम्हें अपने पिता का ठिकाना तो मालूम ही होगा ? तुम हमें अपने पिता का पता बता दो तो तुम्हें ईनाम मिलेगा अन्यथा तुम्हें जिंदा जला दिया जायेगा । '
अंग्रेज सेनापति की बात सुनकर मैना का स्वाभिमान जाग उठा , ' गोरे सरदार शायद तुमने वीरांगनाओं का इतिहास नहीं पढ़ा है । तुम मुझे जला देने की धमकी दे रहे हो , इस बात पर मुझे हँसी आती है । आग ही विपत्ति के समय भारतीय वीरांगनाओं की रक्षा करती है । मैं प्राण देना उचित समझती हूँ पर भेद नहीं बता सकती । '
मैना का ओजस्वी उत्तर सुनकर अंग्रेज सेनापति क्रौध से बौखला उठा और मैना को शैतान लड़की बताकर आग में झोंकने का आदेश दे दिया । अंग्रेज सेनापति द्वारा दी गई सजा को सुनकर आत्मा की अमरता को जानने वाली वीर मैना ने निर्भीकता पूर्वक कहा , ' आज तुम मुझे कोई भी दंड दो , उसकी मुझे कोई चिंता नहीं है लेकिन याद रखो , तुम इस देश को अधिक समय तक गुलाम बनाकर नहीं रख सकोगे । '
गिरफ्तारी के दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व ही अंग्रेजों ने मानवता को शर्मसार करते हुए मैना को खम्बे से बांधकर अंग्नि के हवाले कर दिया । तेरह वर्ष की उम्र में आत्म - उत्सर्ग करने वाली माँ भारती की वीर पुत्री मैना को कोटि - कोटि प्रणाम ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

विजया दशमी उत्सव का संदेश


विजयादशमी उत्सव विजय का प्रतीक है । सम्पूर्ण राष्ट्र भक्तों के अंतःकरण में नव चैतन्य , आत्मविश्वास एवं विजय की आकांक्षा जगाने और उसे पूर्ण करने के लिए समाज की सुसंगठित शक्ति खड़ी करने तथा उसके लिए कटिबद्ध होकर खड़े होने का संदेश देना वाला यह दिवस है । इसका ऐतिहासिक एवं पौराणिक महत्व भी है । सनातन धर्म परंपरा में आश्विन शुक्ल दशमी अक्षय स्फूर्ति , शक्ति पूजा एवं विजय प्राप्ति का दिवस है । किसी भी शुभ , सात्विक तथा राष्ट्र गौरवशाली कार्य को प्रारम्भ करने के लिए यह दिवस सर्वोत्तम माना गया है । विजय की अदम्य प्रेरणा इसके द्वारा प्राप्त है । यह उत्सव आसुरी शक्तियों पर दैवी शक्तियों की विजय का प्रतीक है ।
सत्ययुग में भगवती दुर्गा के रूप में देवताओं की सामूहिक शक्ति ने असुरता का , महिषासुर का मर्दन किया । त्रेता में भगवान श्रीराम ने वनजातियों का सहयोग लेकर , उन्हें संगठित कर विश्वविजेता रावण की आसुरी शक्ति का विनाश किया , रावण का वध किया । द्वापर में इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में दैवी शक्तियों ने संगठित होकर आसुरी शक्तियों का विध्वंश किया । इस दिन शस्त्र पूजन की परंपरा है । बारह वर्ष के वनवास तथा एक वर्ष के अज्ञातवास के पश्चात पाण्डवों ने अपने शस्त्रों का पूजन इसी दिन किया था तथा उन्हें पुनः धारण किया था । प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिन्दुत्व का स्वाभिमान लेकर हिन्दुपद पादशाही की स्थापना करने वाले क्षत्रपति शिवाजी द्वारा सीमोल्लंघन की परम्परा का प्रारम्भ भी इसी दिवस से हुआ था ।
रामलीला तथा दुर्गापूजा इन दोनों उत्सवों को इस विजयशाली दिवस की पावन स्मृति लोक मानस में बनाये रखने की दृष्टि से ही मनाया जाता है । यह शक्ति - उपासना एवं विजय प्राप्ति का पर्व है । संघे शक्ति सर्वदा । दुर्गा पूजा - दुर्गा संगठित शक्ति की प्रतिक है और शस्त्र पूजा शक्ति का प्रतीक है । शस्त्र संचालन के अभ्यास से पौरूष , पराक्रम , साहस , उत्साह व उमंग का संचार होता है और सीमोल्लंघन अर्थात आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त होती है । इस उत्सव के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को शक्ति सम्पन्न बनने और राष्ट्र - धर्म के लिए सर्वस्व अर्पण करने की प्रेरणा दी जाती है । पतित , पराभूत , आत्म - विस्मृत तथा आत्मविश्वास शून्य हिन्दू समाज को शक्तिशाली और वैभवयुक्त बनाने के लिए कितनी भी विकट परिस्थितियों में विचलित न होने , आत्मविश्वास व नीतिमत्ता तथा धैर्य से , प्रबल से प्रबल शत्रुओं को परास्त करने का संदेश देता है यह महान उत्सव ।
सभी को विजयादशमी उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

गांधी जी नेताजी सुभाष की दृष्टि में ?


आजाद हिन्द फौज के पुर्नसंस्थापक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने गांधी जी के जीवन - चरित्र को देखते हुए उनकी तुलना हिटलर जैसे तानाशाह से की थी । यह पढ़कर आप चकित होगें कि क्या यह लेख सत्य है - अंतरराष्ट्रीय मंच से गांधी जी को " राष्ट्रपिता " की उपाधि देने वाले नेताजी सुभाष ने उनकी ऐसी तुलना की होगी , कदापि नहीं । किन्तु यह मध्याह्न के सूर्य की भाँति देदीप्यमान सत्य है - नेताजी सुभाष ने ऐसा ही लिखा है । ऑक्सफोर्ड पूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की पुस्तक " द इंडियन स्ट्रगल 1920 - 1942 " में बोस ने लिखा है कि गांधी ने जनता की मनोभावना का ठीक वैसे ही दोहन किया , जैसे इटली में मुसोलिनी , रूस में लेलिन और जर्मनी में हिटलर ने किया था ।
गांधी जी जानते थे कि भारतीय हिन्दू समाज में यूरोप की तर्ज पर स्थापित चर्च की तरह कभी कोई संस्था नहीं रही , लेकिन भारतीय जन मानस को हमेशा से आध्यात्मिक व्यक्तित्व प्रभावित करते रहे है और लोग उन्हें साधु , संत और महात्मा के रूप में पहचानने लगते है । भारतीय जनता की इसी मनोभावना का दोहन गांधी जी ने मिस्टर गांधी से महात्मा गांधी बनकर किया था ।
नेताजी सुभाष ने गांधी जी को बहुत निकट एवं गहराई से देखा था , उनके साथ भारतीय स्वाधीनता की लडाई लड़ी थी , तो फिर क्या कारण रहें कि गांधी जी को राष्ट्रपिता कहकर सम्मानित करने वाले नेताजी सुभाष ने उनकी तुलना हिटलर जैसे निरंकुश तानाशाह से कर दी ?
इसका कारण खोजने के लिए हमें उस समय के इतिहास के पन्नों को खंगालना होगा । कुछ विशेष कारणों को आप इसी ब्लॉग पर लिखें गये निम्नलिखित लेखों से भी जान सकते है -
1. नेताजी सुभाष के प्रति गांधीजी का द्वेषपूर्ण व्यवहार
2. इरविन - गांधी समझौता और भगतसिंह की फाँसी भाग - एक , भाग - दो
3. अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा वीर नाथूराम गोडसे भाग - एक , भाग - दो , भाग - तीन
4. गौहत्या पर प्रतिबंध के खिलाप गांधी - नेहरू परिवार
5. क्रान्तिकारी सुखदेव का गांधी जी के नाम खुला पत्र ।
- विश्वजीत सिंह ' अनंत '