सोमवार, 11 अप्रैल 2011

क्या गांधी जी राष्ट्रपिता हैँ ?


गांधी जी के कट्टर भक्त, भारत की केन्द्रिय सरकार और कुछ हमारे अपने भारतवासी जो भारत की संस्कृति और इतिहास से अनभिज्ञ हैँ गांधी जी को राष्ट्रपिता कहते हैँ । गांधी जी भी अपने आपकोँ राष्ट्रपिता कहलाने मेँ गर्व का अनुभव करते थे । भारत एक सनातन राष्ट्र हैँ और यहाँ की संस्कृति अरबोँ वर्ष पुरानी हैँ । इससे पुराना राष्ट्र विश्व मेँ कोई दूसरा नहीँ हैँ, तो फिर इसका पिता अट्ठारहवीँ - उन्नीसवीँ ईसाई सदी मेँ कैसे पैदा हो सकता हैँ ! यह महान आश्चर्य की बात है कि अरबोँ वर्षो से यह राष्ट्र बिना पिता के कैसे चल रहा था ?
राष्ट्रपिता की अवधारणा पाश्चात्य मैकालेवाद की देन हैँ । भारत की संस्कृति तो पृथ्वी को, जन्म भूमि को माता के रूप मेँ देखती हैँ और अपने आपकोँ उसका पुत्र मानती हैँ । यदि हम पाश्चात्य अवधारणा पर ही विचार करेँ, तो जो अन्न, विद्या और सुशिक्षा आदि का दान देकर पालन - पोषण और रक्षण करता हैँ, वहीँ पिता कहलाता हैँ । तो क्या गांधी जी ने शास्त्र की आज्ञानुसार इस राष्ट्र का पोषण और रक्षण किया था जो वह राष्ट्रपिता हुये ? जबकि वास्तव मेँ गांधी जी एक ऐसे अहिँसक मसीहा थे जिन्होँने अपने निजी स्वार्थ के लिये स्वतंत्र अखण्ड भारत के उपासक सच्चे देशभक्तोँ को नष्ट कराया और बाद मेँ भारत माता को भी टुकडोँ मेँ विभाजित करा दिया । यदि गांधी जी चाहते तो पाकिस्तान नहीँ बनता ।
गांधी जी इस राष्ट्र के पिता हैँ, तो यह राष्ट्र उनका पुत्र हुआ और जो अपने पुत्र के टुकडे करा देँ, वह पुत्र का रक्षक हुआ या भक्षक ? वास्तव मेँ गांधी जी इस राष्ट्र के पिता तो क्या पुत्र कहलाने के लायक भी नहीँ थे, क्योँकि पुत्र वह होता हैँ जो अपने पिता को दुर्गति से बचाता हैँ । आधुनिक भारत राष्ट्र की दुर्गति करने वाले ही सिर्फ गांधी जी थे, इसलिए वे इस राष्ट्र के पिता तो क्या, पुत्र भी कहलाने के अधिकारी नहीँ हैँ ।
* मैं जानता हूँ कि करोड़ों भारतवासी जो गांधी जी में आस्था रखते है मेरे इस एक लेख से मेरे विरूद्ध हो जायेगे , मुझे उनके आक्रोश का शिकार भी होना पड सकता है , पर क्या करूँ , सच को झुठलाने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है । मैं मानता हूँ कि देवता भी गलती कर सकते है तो इसमें गांधी जी या गोडसे जी अपवाद कैसे हो सकते है , थे तो आखिर वे मनुष्य ही ।
इस लेख पर कोई अन्तिम निणर्य देने से पूर्व इसी ब्लॉग पर लिखे निम्नलिखित लेख :-
1. अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा वीर नाथूराम गोडसे भाग - एक , भाग - दो , भाग - तीन
2. वीर महात्मा नाथूराम गोडसे एक नया दृष्टिकोण
3. इरविन - गांधी समझौता और भगतसिंह की फाँसी भाग - एक , भाग - दो
4. क्रान्तिकारी सुखदेव का गांधी जी के नाम खुला पत्र
5. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के प्रति गांधी जी का द्वेषपूर्ण व्यवहार
6. गांधी जी नेहरू की दृष्टि में ?
7. गौहत्या पर प्रतिबंध के खिलाप गांधी - नेहरू परिवार
8. गांधी जी और हिन्दी भाषा
...... भी पढें और फिर अपना निश्पक्ष निर्णय दे कि क्या गांधी जी राष्ट्रपिता है ?
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

रविवार, 6 मार्च 2011

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक नया दृष्टिकोण भाग - तीन


नेताजी सुभाष की कथित मृत्यु की घोषणा के बाद जवाहर लाल नेहरू ने 1956 मेँ शाहनवाज कमेटी तथा इन्दिरा गांधी ने 1970 मेँ खोसला आयोग द्वारा जांच करवाई तथा दोनोँ जांच रिपोर्टो मेँ नेताजी को उस विमान दुर्घटना मेँ मृत घोषित किया गया । लेकिन जिस देश मेँ यह दुर्घटना होने की खबर थी, उस ताइवान देश की सरकार से, इन दोनोँ आयोगोँ ने बात ही नहीँ की । 1978 मेँ मोरारजी देसाई सरकार ने इन रिपोर्टो को रद्द कर दिया । 1999 मेँ अटलबिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व मेँ तीसरा आयोग बनाया गया । 2005 मेँ ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान की भूमि पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीँ था । मुखर्जी आयोग ने सोनिया गांधी की यूपीए सरकार को अपनी जांच रिपोर्ट सौप दी, जिस मेँ उन्होँने कहा है कि नेताजी सुभाष की मृत्यु उस विमान दुर्घटना मेँ होने का कोई प्रमाण नहीँ हैँ । लेकिन यूपीए सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया । कांग्रेसनीत यूपीए सरकार द्वारा इस रिपोर्ट को रद्द किया जाना वीर महात्मा नाथूराम गोडसे के उस वचन की याद दिलाते हैँ जिसमेँ उन्होँने कहा था कि - ' गांधी व उसके साथी सुभाष को नष्ट करना चाहते थे । '
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का स्वप्न था स्वाधीन, शक्तिशाली और समृद्ध । नेताजी भारत को अखण्ड राष्ट्र के रूप मेँ देखना चाहते थे । लेकिन गांधी - नेहरू की भ्रष्ट साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की नीतियोँ ने देश का विभाजन करके उनके स्वप्न की हत्या कर दी । दो धर्म - दो देश के आधार पर भारत का विभाजन करा दिया गया जो विश्व की सबसे बडी त्रासदी हैँ । कांग्रेस यदि नेताजी की चेतावनी पर समय रहते ध्यान देती और गांधीवाद के पाखण्ड मेँ न फंसी होती तो देश न बटता तथा मानवता के माथे पर भयानक रक्त - पात का कलंक लगने से बच जाता । नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि " आजादी का मतलब सिर्फ राजनीतिक गुलामी से छुटकारा ही नहीं हैं , देश की सम्पत्ति का समान बटवारा , जात-पात के बंधनों और सामाजिक ऊँच-नीच से मुक्ति तथा साम्प्रदायिकता और धर्मांधता को जड से उखाड फेंकना ही सच्ची आजादी होगी । "
आप सभी राष्ट्रवादियोँ से विनम्र निवेदन हैँ कि आप सब भी जाति - धर्म, पार्टी - संगठन आदि के भेद को भूलकर नेताजी के अधूरे स्वप्न को पूरा करने की दिशा मेँ अग्रसर होँ । वास्तव मेँ निस्वार्थ भाव से राष्ट्रहित मेँ अपना सर्वस्य न्यौछावर कर देने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सच्चे नायकोँ मेँ से एक थेँ ।
जय नेताजी सुभाष
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक नया दृष्टिकोण भाग - दो



उस समय गांधीवादी यही समझते थे कि गांधीजी ने पट्टाभी सीतारमैय्या को अपना पूर्ण समर्थन दिया है इसलिए वह आसानी से चुनाव जीत जाएंगे । लेकिन परिणाम उनकी आशा के ठीक विपरीत आया । सुभाष चन्द्र बोस को चुनाव मेँ 1580 मत मिले जबकि पट्टाभी सीतारमैय्या को 1377 मत मिले । गांधीजी के प्रबल विरोध के बावजूद सुभाष 203 मतोँ से चुनाव जीतकर दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने गये । गांधीजी को दुःख हुआ, उन्होँने कहा कि ' सुभाष की जीत गांधी की हार हैँ । ' गांधी व उनके साथियोँ ने सुभाष को उनके कार्यो मेँ सहयोग करना तो दूर उल्टा उन्हेँ मानसिक रूप से प्रताडित करना शुरू कर दिया । सुभाष ने समझोते की बहुत कौशिश की, लेकिन गांधी व गांधी के सहयोगियोँ ने उनकी एक न मानी । आखिर मेँ परेशान होकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया । और 3 मई 1939 मेँ फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी बना ली । सितम्बर 1939 मेँ यूरोप मेँ महायुद्ध छिड गया और फॉरवर्ड ब्लॉक ने नेताजी सुभाष के नेतृत्व मेँ अंग्रेजोँ के विरूद्ध देश भर मेँ प्रदर्शनोँ का आयोजन किया । 1940 मेँ सुमाष को उनके घर मेँ ही नजरबंद कर दिया गया ।
16 जनवरी 1941 को सुभाष ब्रिटिस सरकार के पहरे को तोडकर भेष बदलकर घर से भाग निकले और अखण्ड भारत को अंग्रेजोँ से मुक्त कराने के प्रयास मेँ अफगानिस्तान, रूस होते हुये जर्मनी पहुँच गये । उन्होँने जर्मनी मेँ भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिन्द रेडियोँ की स्थापना की । इसी दौरान सुभाष चन्द्र बोस नेताजी के उपनाम से जाने जाने लगे । 29 मई 1942 को नेताजी एडॉल्फ हिटलर से मिले । हिटलर ने उन्हेँ भारत का उच्च प्रतिनिधि स्वीकार किया और बिना शर्त अपना समर्थन दिया । कुछ वर्ष पूर्ण हिटलर ने ' माईन काम्फ ' नाम से अपना आत्मचरित्र लिखा था जिसमेँ उन्होँने भारत और भारतीय लोगो पर कुछ आपत्तिजनक बाते लिखी थी । नेताजी ने निर्भिक स्वर मेँ हिटलर से अपना विरोध जताया तो हिटलर ने खेद प्रकट किया और अगले संस्करण मेँ भारतीय दृष्टिकोण को बदल देने का वचन दिया ।
13 मई 1943 को नेताजी सुभाष जापान पहुँच गये और वहाँ के प्रधानमन्त्री हिदेकी तोजो से 10 जून 1943 को मुलाकात की । जापान के प्रधानमन्त्री तोजो ने नेताजी सुभाष के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हेँ आजादी की लडाई मेँ सहकार्य करने का आश्वासन दिया । जून 1943 मेँ नेताजी ने टोकियो रेडियोँ से घोषणा की कि ' अंग्रेजोँ से यह आशा करना व्यर्थ हैँ कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड देगे, हमेँ स्वयं भारत के भीतर व बाहर से भी स्वतंत्रता के लिये संघर्ष करना होगा ।
4 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाष ने महान प्रवासी क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस से आजाद हिन्द फौज का दायित्व ग्रहण किया । 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष ने सिंगापुर मेँ स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार की स्थापना की । कुछ ही दिनोँ मेँ विश्व के नौ देशोँ जापान, जर्मनी, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, बर्मा, थाईलैण्ड और आयरलैण्ड ने ' आजाद हिन्द सरकार ' को मान्यता दे दी । जापान ने अंडमान तथा निकोबार द्वीप इस अस्थाई सरकार को दे दिये । नेताजी ने अंडमान का शहीद द्वीप और निकोबार का स्वाराज्य द्वीप नामाकरण करके 30 दिसम्बर 1943 को वहाँ स्वतंत्र भारत का ध्वज फैरा दिया ।
4 फरवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने नेताजी के नेतृत्व मेँ जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिस सेना पर भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय क्षेत्रोँ को अंग्रेजोँ से मुक्त करा लिया । 22 सितम्बर 1944 को नेताजी सुभाष ने रंगून के जुबली हॉल मेँ अपने भाषण मेँ राष्ट्रभक्तोँ का आह्वान करते हुये कहा था कि - ' हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज मेँ हैँ, तुम मुझे खून दोँ, मैँ तुम्हेँ आजादी दूंगा, यह स्वातंत्र्य देवी की मांग हैँ । ' किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध मेँ आगे जाकर अंग्रेजोँ का पलडा भारी पडा और दोनो सेनाओँ को पीछे हटना पडा । ऐसे समय मेँ गांधीजी ने जिनके हाथ मेँ उस समय करोडोँ भारतीयोँ की नब्ज थी और जिनसे आजाद हिन्द फौज को काफी मदद मिल सकती थी सुभाष की सहायता के लिए कुछ नहीँ किया बल्कि गांधी के प्रिय जवाहर लाल नेहरू ने 24 अप्रैल 1945 को गुवाहाटी की एक जनसभा मेँ कहा कि - ' यदि सुभाष चन्द्र बोस ने जापान की सहायता से भारत पर हमला किया तो मैँ स्वयं तलवार उठाकर सुभाष से लडकर रोकने जाऊँगा । '
द्वितीय विश्वयुद्ध मेँ जापान और जर्मनी की हार और भारत मेँ क्रान्तिकारियोँ के प्रति गांधी के नकारात्मक दृष्टिकोण को देखते हुये सुभाष ने अखण्ड भारत की आजादी के लिये रूस से सहायता मांगने का निश्चय किया । 18 अगस्त 1945 को नेताजी ने हवाई जहाज से मांचुरिया के लिए उडान भरी । इस उडान के बाद से नेताजी का कुछ भी प्रमाणित पता नहीँ हैँ ।
23 अगस्त 1945 को जापान की दोमेई समाचार संस्था ने तथाकथित विमान दुर्घटना मेँ नेताजी सुभाष की मृत्यु का समाचार प्रसारित किया । जिस पर स्वभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि नेताजी सुभाष यदि 18 अगस्त 1945 को मर चुके थे तो उन्हेँ 1999 तक राष्ट्र संघ का युद्ध अपराधी घोषित क्योँ किया गया ?
क्रमश ......
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

शनिवार, 5 मार्च 2011

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक नया दृष्टिकोण भाग - एक


23 जनवरी 1897 को कटक के प्रसिद्ध अधिवक्ता जानकीनाथ बोस के घर जन्मेँ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस बाल्यकाल से ही निर्भय, बलवान एवं साहसी थे । इनकी माता प्रभावती एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी । अंग्रेजी प्रबंधकोँ द्वारा भारतीयोँ पर किये जा रहे अत्याचारोँ ने तथा धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द के भाषणोँ एवं लेखोँ ने उनके अंतर्मन पर गहरा प्रभाव डाला, अल्प आयु मेँ ही उन्होँने ग्राम सुधार के क्रान्तिकारी कार्यो मेँ भाग लेना शुरू कर दिया । सुभाष ने 1913 मेँ मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की । 1919 मेँ कोलकात्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की । 15 सितम्बर 1919 को सुभाष इंग्लैँड गये और कैंब्रिज विश्वविद्यालय मेँ प्रवेश ले लिया । आई. सी. एस. की परीक्षा पास कर लेने पर अंग्रेजी सरकार ने उन्हेँ लन्दन मेँ ही नौकरी दे दी । लेकिन सुभाष ने भारत की जनता पर अंग्रेजी सरकार द्वारा किये जा रहे अत्याचारोँ को देखते हुये अंग्रेजोँ की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और 16 जुलाई 1921 को भारत वापस लौटकर मातृभूमि को आजाद करवाने के कार्य मेँ जुट गये । 20 जुलाई 1921 को उन्होँने गांधीजी से मुलाकात की और अपना समर्थन दिया । सुभाष अपने भारत प्रवास के दौरान ग्यारह बार अंग्रेजोँ की कैद मेँ रहें । आजाद हिन्द फौज के पुर्नसंस्थापक एवं आजाद हिन्द सरकार के पुरोधा नेताजी सुभाष ने रंगून के जुबली हॉल मेँ अपने भाषण मेँ राष्ट्रभक्तोँ का आह्वान करते हुये कहा था कि - ' हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज मेँ हैँ, तुम मुझे खून दोँ, मैँ तुम्हेँ आजादी दूंगा । '
राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति सुभाष को प्रेरित करने मेँ चितरंजन दास का विशेष योगदान था । 1922 मेँ सुभाष कलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चुने गये । सुभाष ने अपने कार्यकाल के दौरान कोलकात्ता महापालिका का पूरा तंत्र और कार्यपद्धति को ही बदल डाला । कोलकात्ता के रास्तोँ के नाम बदलकर, उन्हेँ भारतीय नाम दिये गये । स्वतंत्रता संग्राम मेँ प्राण न्योछावर करने वालोँ के परिवार के सदस्योँ को नौकरी दी जाने लगी । बहुत ही कम समय मेँ सुभाष देश के एक महत्वपूर्ण शक्तिशाली युवा नेता बन गये । युवा वर्ग के प्रति उनके विचार काफी दृढ थेँ, वे सदैव युवाओँ को अपने आन्दोलन से जोडते रहेँ । जवाहर लाल नेहरू के साथ मिलकर सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकोँ की इंडिपेडन्स लिग शुरू की ।
1928 मेँ कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन मेँ सुभाष ने गणवेश धारण करके उस समय के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी । गांधीजी उन दिनोँ पूर्ण स्वतंत्रता की मांग से सहमत नहीँ थे और इस अधिवेशन मेँ उन्होँने अंग्रेजी सरकार की अपनिवेशी स्वतंत्रता की सन्धि को स्वीकार कराने की ठान ली थी । लेकिन सुभाष को पूर्ण स्वतंत्रता से पिछे हटना स्वीकार न था । सुभाष ने इस सन्धि का विरोध करते हुये कहा कि हम भारत की पूर्ण आजादी से कम कोई भी बात स्वीकार नहीँ करेंगे । हमेँ अधूरी आजादी स्वीकार नहीँ हैँ । हमेँ पूर्ण स्वतंत्रता चाहिये और हम इसे प्राप्त करने के लिये कुछ भी करने को तैयार हैँ ।
26 जनवरी 1931 के दिन कोलकात्ता मेँ सुभाष स्वतंत्रता के उपासकोँ के एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे, जिस पर पुलिस ने लाठियाँ चलायी और सुभाष को घायल कर दिया । जब सुभाष जेल मेँ थे तो गांधीजी ने चतुराई पूर्वक क्रान्तिकारियोँ मेँ आपसी फूट डालने के लिये अंग्रेजी सरकार से समझोता किया और सब कांग्रेसी कैदियोँ को रिहा किया गया । लेकिन अंग्रेजी सरकार ने भगतसिंह जैसे प्रखर राष्ट्रभक्त क्रान्तिकारियोँ को रिहा करने से इन्कार कर दिया । भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव की फांसी माफ कराने के लिये गांधीजी ने अंग्रेजी सरकार से बात तो की लेकिन उन्हेँ बचाने के लिये कोई दृढ इच्छाशक्ति प्रकट नहीँ की । सुभाष चाहते थे कि इस मुद्दे पर गांधीजी अंग्रेजी सरकार के साथ किया गया समझोता तौड देँ । लेकिन गांधीजी अंग्रेजी सरकार के साथ किया गया समझोता तौडने को तैयार न हुये । अन्त मेँ भगतसिंह और उनके साथियोँ को नियम विरूद्ध 24 मार्च 1931 को प्रातःकाल दी जाने वाली फाँसी 23 मार्च को शाम मेँ ही दे दी गई, सारा देश इस अन्याय के खिलाप उठ खडा हुआ, लेकिन गांधीजी शान्त रहेँ । भगतसिंह को न बचा पाने के कारण सुभाष तथा अन्य राष्ट्रवादी युवा गांधीजी की नीतियोँ के विरोधी हो गये ।
नेताजी सुभाष मेँ नेतृत्व के सभी गुण विद्यमान थे । प्रखर देशभक्ति, त्याग की भावना, कार्य निष्पादित करने की लगन, दार्शनिकता और दूरदर्शी सोच । अतः 1938 मेँ सुभाष को कांग्रेस के 51 वेँ अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया । अपने अध्यक्ष पद के कार्यकाल मेँ सुभाष ने योजना आयोग की स्थापना की और जवाहर लाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया । इसी दौरान यूरोप मेँ द्वितीय विश्व युद्ध के बादल छा गए । सुभाष चाहते थे कि इंग्लैँड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत की आजादी की लडाई को ओर तेज किया जाये । यह भारत की आजादी के लिए स्वर्णिम अवसर है । लेकिन गांधीजी को उनके स्वतंत्रता के हेतुक कार्यकलाप पसंद नहीँ आये और वह उनके विचारोँ से सहमत नहीँ हुये ।
1939 मेँ जब कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुनने का समय आया तो सुभाष चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बनाया जाये जो अखण्ड भारत की पूर्ण आजादी के विषय पर किसी के दबाव के सामने न झुके । ऐसा कोई व्यक्ति सामने न आने पर सुभाष ने स्वयं अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहा । लेकिन गांधीजी जिस बात को अपने अनुकूल नहीँ पाते थे उसे दबा देते थे । सुभाष कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहते हुए गांधी की नीतियोँ पर नहीँ चले अतः गांधीजी व उनके साथी सुभाष को अपने रास्ते से हटाना चाहते थे । गांधीजी ने सुभाष के खिलाप पट्टाभी सीतारमैय्या को चुनाव लडाया । किन्तु उस समय गांधी से कही ज्यादा लोग सुभाष को चाहते थे । उस समय सिर्फ सुभाष ही थे जिन्होँने लोगो के दिलोँ पर राज किया था ।
क्रमश ......
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

रविवार, 23 जनवरी 2011

युवाओँ के प्रेरणा स्रोत धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द भाग - दो


1897 मेँ भारत वापस आकर स्वामी विवेकानन्द ने भारतीयोँ को हजारोँ वर्षो के आलस्य को छोडकर नए आत्मविश्वास के साथ भारत को विश्व गुरू बनाने के लिए उठ खडे होने तथा समाज के वंचित वर्गो व स्त्रियोँ को शिक्षित करने और विद्या एवं स्वालम्बन द्वारा उनके उत्थान के माध्यम से देश का उत्थान करने का संदेश दिया । स्वामी विवेकानन्द ने स्वदेश मन्त्र देते हुए कहा -
हे भारत ! तुम यह मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियोँ का आदर्श सीता, सावित्री, दमयन्ती है , मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य सर्वत्यागी उमानाथ शंकर है, मत भूलना कि तुम्हारा विवाह, धन और जीवन, इन्द्रिय - सुख के लिये, अपने व्यक्तिगत सुख के लिये नहीँ है, मत भूलना कि तुम जन्म से ही ' माता ' के लिये बलिस्वरूप रखे गये गए हो, तुम मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया की छाया मात्र हैँ, मत भूलना कि नीच, अज्ञानी, दरिद्र, चमार और मेहतर तुम्हारे रक्त हैँ, तुम्हारे भाई हैँ । हे वीर ! साहस का आश्रय लो । गर्व से कहो कि मैँ भारतवासी हूँ और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्रह्मण भारतवासी, चाण्डाल भारतवासी - सब मेरे भाई हैँ । भारतवासी मेरे प्राण हैँ, भारत की देव - देवियाँ मेरे ईश्वर हैँ, भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, जवानी की फुलवारी और बुढापे की काशी है । भाई, बोलो कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग हैँ, भारत के कल्याण से मेरा कल्याण हैँ, और रात - दिन कहते रहोँ - हे गौरीनाथ ! हे जगदम्बे ! मुझे मनुष्यत्व दो, माँ ! मेरी दुर्बलता और कापुरूषता दूर कर दो । माँ मुझे मनुष्य बना दो ।
स्वामी विवेकानन्द ने अपने कार्य को दृढ आधार प्रदान करने के लिए 1 मई 1897 को कलकत्ता मेँ ' रामकृष्ण मिशन ' और 9 दिसम्बर 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर मेँ ' रामकृष्ण मठ ' की स्थापना की । निवेदिता गर्ल्स स्कूल की स्थापना की गई तथा अनेक पत्रोँ का प्रकाशन एवं साहित्य का सृजन किया गया । उनके अंग्रेज शिष्य कैप्टेन सर्वियर तथा श्रीमती सर्वियर द्वारा स्वामी विवेकानन्द की इच्छानुसार मायावती ( अल्मोडा ) मेँ ' अद्वैत आश्रम ' की स्थापना की गई । स्वामीजी के अनुयायी उनके निर्देशानुसार ' नर सेवा, नारायण सेवा ' के काम मेँ लग गये ।
4 जुलाई 1902 को बेलूर के रामकृष्ण मठ मेँ उन्होँने ध्यान की अवस्था मेँ महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिये । उनका पार्थिव शरीर चला गया, किन्तु अपनी चिर, अमरता का संदेश देने के लिए उनके वे शब्द स्थाई एवं चिर व्याप्त है जो उन्होँने मिस्टर एरिक हैमंड को लन्दन मेँ कहे थे, - ' सम्भवतः यह अच्छा होगा कि मैँ अपने इस शरीर के बाहर निकल आऊं और इसे जीर्ण वस्त्र की भांति उतार फेकूं, किन्तु फिर भी मैँ कार्य करने से रूकूंगा नहीँ । मानव समाज मेँ मैँ तब तक सर्वत्र प्रेरणा प्रदान करता रहूंगा जब तक कि संसार यह भाव आत्मसात न कर लेँ कि वह ईश्वर के साथ एक है । '
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, कवि रविन्द्रनाथ टैगोर और महर्षि अरविन्द घोष जैसे महान व्यक्तियोँ ने धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द को भारत की आत्मा को जाग्रत करने वाला और राष्ट्रवाद के युगनायक के रूप मेँ देखा । भारत सरकार ने भी उनके सम्मान मेँ उनके जन्मदिन 12 जनवरी को ' राष्ट्रीय युवा दिवस ' के नाम से घोषित किया है । स्वामी विवेकानन्द के कुछ अमर संदेश प्रस्तुत है -
* " उतिष्ठित, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत् " - उठो, जागो और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये ।
* ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्धि कर सकता है । सभी जीवन्त ईश्वर है - इस भाव से सबको देखोँ । मनुष्य का अध्ययन करोँ, मनुष्य ही जीवन काव्य है । जगत मेँ जितने ईसा या बुद्ध हुये हैँ, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्यमान है । इस ज्योति को छोड देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीँ रह सकेँगे, मर जायेँगे । तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहोँ ।
* जिसका जो जी चाहे कहे, अपने आप मेँ मस्त रहोँ- दुनियां तुम्हारे पैरोँ तले आ जाएगी, चिन्ता मत करोँ । लोग कहते है - इस पर विश्वास करोँ, उस पर विश्वास करोँ, मैँ कहता हूँ - अपने आप पर विश्वास करोँ । अपने पर विश्वास करोँ - सब शक्ति तुम मेँ है, इसको धारण करोँ और शक्ति जगाओँ - कहो हम कुछ भी कर सकते हैँ ।
* हे मेरे युवक बन्धुगण ! बलवान बनोँ - यहीँ तुम्हारे लिए मेरा उपदेश है । गीता पाठ करने की अपेक्षा फुटबॉल खेलने से तुम स्वर्ग के अधिक नजदीक पहुंचोगे । मैने अत्यन्त साहसपूर्वक ये बाते कही है और इनकोँ कहना अत्यावश्यक हैँ, कारण मैँ तुमको प्यार करता हूँ । मैँ जानता हूँ कि कांटा कहाँ चुभता हैँ । मैँने कुछ अनुभव किया है । बलवान शरीर से और मजबूत पुट्ठोँ से तुम गीता को अधिक समझ सकोगे ।
* मन का विकास करो और उसका संयम करोँ, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो - उससे अतिशीघ्र फल प्राप्ति होगी । यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय । एकाग्रता सीखो और जिस और इच्छा हो, उसका प्रयोग करो । ऐसा करने पर तुम्हे कुछ खोना नहीँ पडेगा ।
* वीरता के साथ आगे बढो । एक दिन या एक वर्ष मे सिद्धी की आशा न रखो । उच्चतम आर्दश पर दृढ रहो । स्थिर रहो । स्वार्थपरता और ईष्या से बचो । आज्ञा-पालन करो । सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे । याद रखो व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय कुछ भी नही ।
* संसार का इतिहास उन थोडे से व्यक्तियोँ का इतिहास है जिनमेँ आत्मविश्वास था । विश्वास-विश्वास ! अपने आप पर विश्वास, परमात्मा पर विश्वास - यही उन्नति करने का एकमात्र उपाय है । यदि पुराणो के तेँतीस करोड देवताओँ के ऊपर और विदेशियो ने बीच - बीच मे जिन देवताओँ को तुम्हारे बीच मे घुसा दिया है, उन सब पर तुम्हारा विश्वास हो और अपने आप पर विश्वास न हो, तो तुम कदापि मोक्ष के अधिकारी नही हो सकते ।
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

युवाओँ के प्रेरणा स्रोत धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द भाग - एक


" उतिष्ठित, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत् " - उठो, जागो और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये, का सन्देश देने वाले स्वामी विवेकानन्द एक ऐसे सन्यासी धर्मयोद्धा का नाम है जिन्होँने आधुनिक इतिहास मेँ पहली बार सनातन वैदिक संस्कृति का अंतरराष्ट्रिय स्तर पर प्रतिनिधित्व किया । उन्होँने अपने सम्बोधन की शुरूआत ' बहनोँ और भाईयोँ ' से की जिसे सुनकर श्रोताओँ ने खडे होकर ऐसी तुमुल तालियोँ की बोछार की जो लगातार दो मिनट तक जारी रही और जिससे पूरा सभामण्डप गूँज उठा । श्रोतागण भी कोई साधारण मानवोँ का समूह नहीँ था, विश्व के कोने - कोने से आमन्त्रित सात हजार तत्वचिन्तक और प्रबुद्ध विद्वान थे । यह उस समय की बात है जब भारत परतंत्र था और पाश्चात्य जगत को भारत और भारतीयोँ के नाम से भी घृणा थी ।
स्वामी विवेकानन्द एक युगांतरकारी प्रतिभाशाली मनीषी थे । उनकी अलौकिक प्रतिभा केवल आध्यात्मिक क्षेत्र मेँ ही प्रस्फुटित नहीँ हुई अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मेँ उनकी दिव्य - दृष्टि का संचरण हुआ है । उन्होँने राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग , स्वाधीन भारत, कला, भाषा-संस्कृति, राष्ट्रधर्म, सन्यास, दलितोद्धार, शिक्षा, नारी सशक्तिकरण आदि विविध विषयोँ पर मौलिक विचार प्रकट किये है जिनकी प्रासांगिकता आने वाली पीढियोँ के लिए भी बनी रहेगी । स्वामीजी ने परतंत्रता, पाखण्ड और कुरूतियोँ की बेडियोँ मेँ जकडकर नष्ट हो चले हिन्दू धर्म को गतिशील एवं व्यवहारिक बनाया तथा सुदृढ भारत के पुनर्निमाण के लिए लोगोँ से पश्चिमी विज्ञान और भौतिकवाद को भारत की आध्यात्मिक संस्कृति से जोडने का आग्रह किया ।
स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 ईश्वी मेँ कलकत्ता ( वर्तमान कोलकाता ) के एक कुलीन परिवार मेँ हुआ । इनका पूर्व - आश्रम नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था, सन्यास लेने के बाद मेँ अपने शिष्य खेतडी नरेश के अनुरोध पर अपना नाम ' विवेकानन्द ' धारण किया । इनके पिता थे विश्वनाथदत्त और माता का नाम था श्रीमती भुवनेश्वरी देवी । इनमेँ एक ओर जहाँ आध्यात्मिकता के प्रति जन्मजात प्रवृत्ति तथा प्राचिन धार्मिक प्रथाओँ के प्रति आदर था, वही दूसरी ओर उतना ही उनका प्रखर बुद्धियुक्त तार्किक स्वभाव था । वह प्रत्येक समस्या के समाधान के लिये वे अकाटय दलीलोँ की अपेक्षा किया करते थे । इसके लिए वे अनेक प्राख्यात धार्मिक नेताओँ से मिले किन्तु संतोष जनक उत्तर न पा सके - उनकी आध्यात्मिक प्यास और भी बढ गई ।
1881 मेँ वह स्वामी रामकृष्ण परमहंस से मिले । नरेन्द्रनाथ ने उनसे पूछा, " महानुभाव, क्या आपने ईश्वर को देखा है ' ' हाँ, मैँने उन्हेँ देखा है, ठीक ऐसे ही जैसे तुम्हेँ देख रहा हूँ, बल्कि तुमसे भी अधिक प्रगाढ रूप से । " - श्रीरामकृष्ण देव ने दृढता से उत्तर दिया । नरेन्द्रनाथ का संशय स्वाहा हो गया, शिष्य की दीक्षा का यही से प्रारम्भ हुआ । 1881 से 1886 तक स्वामी विवेकानन्द अपने गुरू परमहंस रामकृष्ण से आध्यात्मिक जीवन की विद्या ग्रहण करते रहे । मात्र 16 वर्ष की अवस्था मेँ दक्षिणेश्वर के दिव्य संत से मिलन के बाद इनका जीवन सन्यास के रूप मेँ परिणित हो गया ।
अपनी महासमाधि के तीन - चार दिन पूर्व श्रीरामकृष्णदेव ने नरेन्द्रनाथ को अपनी स्वयं की सारी शक्ति दे डाली और उनसे कह दिया - ' मेरी इस शक्ति से जो तुममेँ संचारित कर दी है, तुम्हारे द्वारा बडे - बडे काम होँगे और उसके बाद तुम वहाँ चले जाओगे जहाँ से आये होँ ।' शक्तिपात्त के बाद स्वामी विवेकानन्द के दृष्टिकोण मेँ एक जबर्दस्त परिवर्तन हुआ । भारतवर्ष को अच्छी प्रकार से जानने और पुनर्निमाण करने की तीव्र आकांक्षा से प्रेरित होकर उन्होँने छ्ह वर्षो तक सम्पूर्ण भारत का पैदल भ्रमण किया, इस काल मेँ उनको कई दिनोँ तक भूखे भी रहना पडा । अपने भ्रमण काल मेँ वस सामर्थ्यवानोँ और गरीबोँ दोनोँ के अतिथि रहेँ । उनकी भारत भ्रमण की यह यात्रा कन्याकुमारी मेँ सम्पन्न हुई । वहाँ स्वामी विवेकानन्द ने परम वैभलशाली भारत के पतन के कारणोँ का मनन किया और उन साधनोँ का चिन्तन किया जिससे भारत का पुनर्निमाण होँ । उसी क्षण उन्होँने पाश्चात्य देश मेँ होने वाली शिकागो धर्म संसद मेँ जाने का निश्चय किया ।
अपने नवयुवक भक्तोँ और खेतडी नरेश के आर्थिक सहयोग से स्वामीजी शिकागो पहुंचे । शिकागो धर्म संसद मेँ वह बिना आमंत्रण के गये थे, अतः परिषद् मेँ उनको प्रवेश की अनुमति मिलनी कठिन हो गयी । उनकोँ प्रवेश न मिले, इसका भरपूर प्रयत्न किया गया । उस समय भारतीय होना पाप समक्षा जाने लगा था तथा पाश्चात्य जगत हिन्दू संस्कृति से घृणा करता था । हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट के उद्योग से किसी प्रकार उन्हेँ धर्मसभा मेँ समय मिला और 11 सितम्बर 1893 को उनकी अपरोक्षानुभूति से निकले औजस्वी तत्वज्ञान ने पाश्चात्य जगत को चौका दिया । स्वामी विवेकानन्द ने अपने भाषण की शुरूआत " अमेरिकी बहनोँ और भाईयोँ " से की तथा वहाँ एकत्र विद्वानोँ को वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश देने वाले भारत एवं हिन्दू धर्म के वेदान्तिक संदेशोँ से अवगत कराया जो सभी धर्मो का सार है । अपने औजस्वी विचारोँ द्वारा उन्होँने भारत तथा हिन्दू धर्म की गौरवमय भव्यता को जाग्रत किया । 1893 से 1896 तक स्वामीजी ने पाश्चात्य देशोँ मेँ भ्रमण कर औजस्वी भाषण दिये, वेदान्त समिति की स्थापना की, उनके ग्रन्थ राजयोग का संकलन किया गया । अनेक विद्वानोँ ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया जिनमेँ कैप्टेन तथा श्रीमती सर्वियर, भगिनी निवेदिता, ई. टी. स्टर्डी एवं जे. जे. गुडविन प्रमुख है । पाश्चात्य देशोँ मेँ भारत तथा हिन्दू धर्म की विजय पताका फैराकर स्वामी विवेकानन्द भारत वापस लौट आये ।
क्रमश ......
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

लालचौक पर तिरंगा न फैलायेँ भारतीय युवा - उमर अब्दुल्ला


क्या जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नही है या वह किसी इस्लामिक राष्ट्र का अंग है ! वहाँ के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बयान से तो यही लगता है । इतिहास की दृष्टि से देखे तो जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिँह ने उसका भारत मेँ विधिवत विलय किया था । लेकिन मोहनदास गांधी द्वारा आधुनिक भारतीय राजनीति मेँ बोये गये मुस्लिम तुष्टिकरण के बीज को जवाहरलाल नेहरु ने सीँचकर विशाल वट वृक्ष और भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर को भारत का सर दर्द बना दिया । जिसका फायदा अलगाववादी आतंकवादी, उमर अब्दुल्ला जैसी सोच के कट्टर स्वार्थी मुसलमान, भारत सरकार से सम्मान पाने वाली विश्व विख्यात देश की गद्दार लेखिका अरुन्धति राँय और हमारेँ अल्पसंख्यक हित चिन्तक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता उठाते है । तभी तो एक ओर जहाँ जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर के लालचौक ( वह स्थान जहाँ राष्ट्रवादी चिन्तक व राजनेता डाँ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान हुआ था । ) पर राष्ट्रीय झंडा तिरंगा फैराने की भारतीय युवाओँ की पवित्र भावनाओँ का विरोध करते हुए इससे राज्य के हालात बिगडने का आरोप लगाया । वही दूसरी ओर जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चेयरमैन आतंकवादी मौहम्मद यासीन मलिक ने तो राष्ट्रभक्त युवाओँ को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हेँ लालचौक मेँ तिरंगा नहीँ फैराने दिया जायेगा । गद्दार लेखिका अरुन्धति राँय भी जम्मू कश्मीर को भारत का अंग मानने से इन्कार कर चुकी है । और वर्तमान भारतीय राजनीति वोट बैँक के चक्कर मेँ नपुंसक हो चुकी है । ऐसी स्थिति मेँ क्या हमेँ लगता है कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है ।
जम्मू कश्मीर को दिये गये विशेषाधिकार अनुच्छेद 370 के कारण भारतीय नागरिक उसकी रक्षा के लिए अपनी जान तो दे सकता है लेकिन वहाँ पर जमीन का एक टुकडा भी नहीँ खरीद सकता । खुद जम्मू कश्मीर के अन्दर भी जम्मू और लद्दाख सम्भागोँ के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है । अब समय आ गया है कि हम जम्मू कश्मीर समस्या के स्थाई समाधान की दिशा मेँ कुछ ठोस करेँ । आज के स्वार्थी राजनीतिक माहौल मेँ केवल लालचौक पर तिरंगा फैलाने से कुछ न होगा । इसके लिए हमेँ जम्मू कश्मीर को तीन हिस्सोँ जम्मू, कश्मीर और लद्दाख मेँ बाटना होगा । जिसके लिए हमे अमरनाथ श्राईन बोर्ड आंदोँलन की तर्ज पर एक दीर्घकालिक योजना बद्ध उग्र आंदोँलन छेडना होगा । जिसे जम्मू और लद्दाख सम्भाग के निवासी शुरु करेँ और शेष भारत के नागरिक उसका सभी तरह से समर्थन करेँ । जम्मू कश्मीर के तीन हिस्सोँ मेँ बटते ही अनुच्छेद 370 अपने आप हट जायेगा तथा वहाँ पर देशद्रोहियोँ को मुँह की खानी पडेगी । यह भारत के दीर्घकालिक हित मेँ हैँ, इसके अतिरिक्त जम्मू कश्मीर मेँ भारतीय एकता का दूसरा कोई स्थाई विकल्प नहीँ हैँ ।
वन्दे मातरम्
विश्वजीत सिंह 'अनंत'