एक बार प्राख्यात साहित्यकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र इंडोनेशिया की यात्रा पर गए । वहाँ मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया के कला विभाग के निदेशक सुदर्शन के साथ वह कुछ प्राचीन स्थलों का अवलोकन करने निकले । सुदर्शन इस्लाम मतावलम्बी थे । वे दोनों बोरोबुदुर देखने जा रहे थे । रास्ते में कुछ संगतराश पत्थरों पर कुछ अक्षर खोद रहे थे । डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी ने जिज्ञासा प्रकट की और पूछा कि पत्थरों पर ये क्या लिख रहे हैं । सुदर्शन ने बताया कि यहाँ के कुछ लोग मरणोपरांत अपनी कब्र पर लगाए जाने वाले पत्थर पर जावाई भाषा में महाभारत या रामायण की कोई पंक्ति खुदवाते हैं । मुस्लिम होते हुए भी वे राम व कृष्ण के प्रति गहरी आस्था रखते हैं ।
डॉ. विद्यानिवास मिश्र को आश्चर्यचकित देख सुदर्शन ने कहा - ' हमने सात सौ वर्ष पहले इस्लाम स्वीकार किया था , लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम अपने पूर्वजों को ही भूल जाएं । रामायण और महाभारत हमारे लिए आज भी प्रेरणादायक हैं । ' डॉ. विद्यानिवास मिश्र उस इंडोनेशियाई मुस्लिम विद्वान का मुहं देखते रह गये ।
जब इंडोनेशिया के मुस्लिम अपने मूलधर्म व पूर्वजों पर गर्व कर सकते है तो भारतीय मुस्लिम अपनी मूल सनातन संस्कृति , हिन्दू धर्म और महापुरूषों पर गर्व क्यों नहीं कर सकते ! ! !

- विश्वजीत सिंह ' अनंत '
यही तो हमारे देश की बात है |अब किस किस को समझायंगे
जवाब देंहटाएंविश्वजीत जी ,
जवाब देंहटाएंबेहद प्रेरणादायी प्रकरण का जिक्र किया है आपने । काश सभी , इसी प्रकार से अपने पूर्वजों पर गर्व कर सकें तो शायद बहुत से भेद मिट जायेंगे।