मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

गौहत्या पर प्रतिबंध के खिलाप गांधी - नेहरू परिवार




मोहनदास कर्मचन्द गांधी जी कहा करते थे कि गौरक्षा करने से मोक्ष मिलता हैं । सन 1921 में गोपाष्टमी के अवसर पर पटौदी हाउस में एक सभा के अन्दर , जिसमें हकीम अजमल खान , डॉ. अन्सारी , लाला लाजपतराय , पं. मदन मोहन मालवीय आदि उपस्थित थे , तभी इन सभी लोगों के समझ एक प्रस्ताव पास कराया गया कि -
" गौहत्या को अंग्रेजी सरकार कानूनी दृष्टि से बन्द करे , नहीँ तो देशव्यापी असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया जायेगा । "
इसके बाद कांग्रेस के कार्यक्रमों में ' गौरक्षा ' सम्मेलनों का आयोजन होने लगा । ( आर्गनाइजर 26 फरवरी 1995 द्वारा रमाशंकर अग्निहोत्री )
परन्तु गांधी जी ने यह पाखण्ड केवल हिन्दुओं को अपना अनुयायी बनाने के लिए किया था ।
15 अगस्त 1947 को भारत के आजाद होने पर देश के कोने - कोने से लाखों पत्र और तार प्रायः सभी जागरूक व्यक्तियों तथा सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा भारतीय संविधान परिषद के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के माध्यम से गांधी जी को भेजे गये जिसमें उन्होंने मांग की थी कि अब देश स्वतन्त्र हो गया हैं अतः गौहत्या को बन्द करा दो । तब गांधी जी ने कहा कि -
" राजेन्द्र बाबू ने मुझको बताया कि उनके यहाँ करीब 50 हजार पोस्ट कार्ड , 25 - 30 हजार पत्र और कई हजार तार आ गये हैं । हिन्दुस्तान में गौ - हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं , उनके साथ जबरदस्ती करना होगा . . . . . . जो आदमी अपने आप गौकुशी नहीं रोकना चाहते , उनके साथ मैं कैसे जबरदस्ती करूँ कि वह ऐसा करें । इसलिए मैं तो यह कहूँगा कि तार और पत्र भेजने का सिलसिला बन्द होना चाहिये इतना पैसा इन पर फैंक देना मुनासिब नहीं हैं । मैं तो अपनी मार्फत सारे हिन्दुस्तान को यह सुनाना चाहता हूँ कि वे सब तार और पत्र भेजना बन्द कर दें । भारतीय यूनियन कांग्रेस में मुसलमान , ईसाई आदि सभी लोग रहते हैं । अतः मैं तो यही सलाह दूँगा कि विधान - परिषद् पर इसके लिये जोर न डाला जाये । " ( पुस्तक - ' धर्मपालन ' भाग - दो , प्रकाशक - सस्ता साहित्य मंडल , नई दिल्ली , पृष्ठ - 135 )
गौहत्या पर कानूनी प्रतिबन्ध को अनुचित बताते हुए इसी आशय के विचार गांधी जी ने प्रार्थना सभा में दिये -
" हिन्दुस्तान में गौ-हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं उनके साथ जबरदस्ती करना होगा । " - ' प्रार्थना सभा ' ( 25 जुलाई 1947 )
हिन्दुस्तान ( 26 जुलाई 1947 ) , हरिजन एवं हरिजन सेवक ( 26 जुलाई 1947 )
अपनी 4 नवम्बर 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी जी ने फिर कहा कि -
" भारत कोई हिन्दू धार्मिक राज्य नहीं हैं , इसलिए हिन्दुओं के धर्म को दूसरों पर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता । मैं गौ सेवा में पूरा विश्वास रखता हूँ , परन्तु उसे कानून द्वारा बन्द नहीं किया जा सकता । "
( दिल्ली डायरी , पृष्ठ 134 से 140 तक )
इससे स्पष्ट हैं कि गांधी जी की गौरक्षा के प्रति कोई आस्था नहीं थी । वह केवल हिन्दुओं की भावनाओं का शौषण करने के लिए बनावटी तौर पर ही गौरक्षा की बात किया करते थे , इसलिए उपयुक्त समय आने पर देश की सनातन आस्थाओं के साथ विश्वासघात कर गये ।
7 नवम्बर 1966 को गोपाष्टमी के दिन गौरक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं ने संयुक्त रूप से संसद भवन के सामने एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया जिसमें तत्कालीन सरकार से गौहत्या बन्दी का कानून बनाने की मांग की गई । इस प्रदर्शन में भारत के प्रत्येक राज्य से करीब 10 - 12 लाख गौभक्त नर - नारी , साधु - संत और छोटे - छोटे बालक - बालिकाएं भी गौमाता की हत्या बन्द कराने इस धर्मयुद्ध में आये थे ।
उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर थी और गुलजारिलाल नन्दा गृहमंत्री थे । श्री नन्दा जी ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परामर्श दिया कि इतनी बडी संख्या में देशभर के सर्व विचारों के जनता की मांग गौहत्या बन्दी का कानून स्वीकार करें । तब इंदिरा गांधी ने कठोरता से कहा " गौहत्या बन्दी का कानून बनाने से मुसलमान और ईसाई समाज कांग्रेस से नाराज हो जायेंगे । गौहत्या बन्दी का कानून नहीं बन सकता । " इंदिरा के न मानने पर गुलजारिलाल नन्दा ने अपने गृहमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और गौभक्त भारतीयों के इतिहास में अमर हो गये ।
उधर इंदिरा गांधी ने प्रदर्शन खत्म कराने के लिए निहत्थे अहिंसक गौभक्तों प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवा दी जिसमें अनेकों साधुओं व गौभक्तों की हत्याएँ हुई । इंदिरा गांधी ने यह नृशंश हत्याकाण्ड गौपाष्टमी के पर्व पर कराया था अतः विधि का विधान देखिये कि - इंदिरा गांधी की हत्या भी गौपाष्टमी को हुई थी , संजय गांधी की दुर्घटना में मृत्यु भी अष्टमी को हुई , राजीव गांधी की हत्या भी अष्टमी को हुई , गौहत्या के महापाप से गांधी - नेहरू परिवार का नाश हो गया ।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के इतने दिन बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर गौहत्या बन्दी का कानून न बन पाना भारतीयों के लिए बडे ही दुःख और अपमान की बात हैं । हे परमात्मा , नेहरू के वंशजों और गांधी के अनुयायी इन राजनेताओं को सद्बुद्धि दो । भारत की प्राणाधार गौमाता की हत्या बन्दी का कानून सम्प्रदायवाद की भावना से उठकर शीघ्र बने यहीं प्रार्थना हैं ।
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

इरविन - गांधी समझौता और भगतसिँह की फाँसी



मार्च 1931 मेँ गांधीजी ने ब्रिटिस सरकार के प्रतिनिधि लार्ड एडवर्ड इरविन के साथ समझौता किया । इस समझौते के अन्तर्गत ब्रिटिस सरकार द्वारा कांग्रेसी आन्दोलन के सभी बंदी छोड दिये गये , परन्तु क्रान्तिकारी आन्दोलन गदर पार्टी के बंदी , लोदियोँ मार्शल ला के बंदी , अकाली बंदी , देवगढ , काकोरी , महुआ बाजार और लाहौर षडयन्त्र केश आदि के बंदियोँ को छोडने से इन्कार कर दिया । गांधीजी ने भी इस समझौते के अनुपालन मेँ अपना आन्दोलन वापस ले लिया और अन्य आन्दोलन कर्ता क्रान्तिकारियोँ से भी अपना आन्दोलन वापस लेने की अपील की । गांधीजी की अपील के प्रत्युत्तर मेँ लाहौर षडयन्त्र केस के क्रान्तिकारी सुखदेव ने गांधीजी के नाम खुला पत्र लिखकर गांधीजी पर क्रान्तिकारियोँ को कुचलने के लिए ब्रिटिस सरकार का साथ देने का आरोप लगाया था और पत्र मेँ दो विचार धाराओँ के बीच मतभेदोँ पर प्रकाश डाला था । उन्होँने इस समझोते पर सवाल खडे किये थे तथा गांधीजी से अपनी शंका का समाधान करने का आग्रह किया था । लेकिन गांधीजी ने सुखदेव के जीते - जी उनके पत्र का कोई उत्तर नहीँ दिया था । सुखदेव के पत्र का संक्षिप्त सार यह हैँ -
अत्यन्त सम्मानीय महात्मा जी आपने क्रान्तिकारियोँ से अपना आन्दोलन रोक देने की अपील निकाली हैँ । कांग्रेस लाहौर के प्रस्तावानुसार स्वतन्त्रता का युद्ध तब तक जारी रखने के लिए बाध्य हैँ जब तक पूर्ण स्वाधीनता ना प्राप्त हो जाये । बीच की संधिया और समझौते विराम मात्र हैँ । यद्यपि लाहौर के पूर्ण स्वतन्त्रता वाले प्रस्ताव के होते हुए भी आपने अपना आन्दोलन स्थगित पर दिया हैँ , जिसके फलस्वरूप आपके आन्दोलन के बन्दी छुट गए हैँ । परन्तु क्रान्तिकारी बंदियोँ के बारे मेँ आप क्या कहते हो । सन 1915 के गदर पार्टी वाले राजबंदी अब भी जेलोँ मेँ सड रहे हैँ , यद्यपि उनकी सजाऐ पूरी हो चुकी हैँ । लोदियोँ मार्शल ला के बंदी जीवित ही कब्रो मेँ गडे हुए है , इसी प्रकार दर्जनोँ बब्बर अकाली कैदी जेल मेँ यातना पा रहे है । देवगढ , काकोरी , महुआ बाजार और लाहौर षडयन्त्र केस , दिल्ली , चटगॉव , बम्बई , कलकत्ता आदि स्थानोँ मेँ चल रहे क्रान्तिकारी फरार , जिनमेँ बहुत सी तो स्त्रियाँ है । आधा दर्जन से अधिक कैदी तो अपनी फाँसियोँ की बाट जोह रहे हैँ । इस विषय मेँ आप क्या कहते हैँ । लाहौर षडयन्त्र के हम तीन राजबंदी जिन्हेँ फाँसी का हुक्म हुआ है और जिन्होँने संयोगवश बहुत बडी ख्याति प्राप्त कर ली है , क्रान्तिकारी दल के सब कुछ नहीँ हैँ । देश के सामने केवल इन्ही के भाग्य का प्रश्न नहीँ हैँ । वास्तव मेँ इनकी सजाओँ के बदलने से देश का उतना कल्याण न होगा जितना की इन्हेँ फाँसी पर चढा देने से होगा ।
परन्तु इन सब बातोँ के होते हुए भी आप इनसे अपना आन्दोलन खीँच लेने की सार्वजनिक अपील कर रहे है । अपना आन्दोलन क्योँ रोक ले , इसका कोई निश्चित कारण नहीँ बतलाया । ऐसी स्थिति मेँ आपकी इन अपीलोँ के निकालने का मतलब तो यहीँ हैँ कि आप क्रान्तिकारियोँ के आन्दोलन को कुचलने मेँ नौकरशाही का साथ दे रहेँ होँ । इन अपीलोँ द्वारा स्वयं क्रान्तिकारी दल मेँ विश्वासघात और फूट की शिक्षा दे रहे होँ । गवर्नमेँट क्रान्तिकारियोँ के प्रति पैदा हो गयी सहानुभूति तथा सहायता को नष्ट करके किसी तरह से उन्हेँ कुचल डालना चाहती है । अकेले मेँ वे सहज ही कुचले जा सकते है , ऐसी हालत मेँ किसी प्रकार की भावुक अपील निकाल कर उनमेँ विश्वासघात और फूट पैदा करना बहुत ही अनुचित और क्रान्ति विरोधी कार्य होगा । इसके द्वारा गवर्नर को , उन्हेँ कुचल डालने मेँ प्रत्यक्ष सहायता मिलती हैँ । इसलिए आपसे हमारी प्रार्थना है कि या तो आप क्रान्तिकारी नेताओँ से जो कि जेलोँ मेँ हैँ , इस विषय पर सम्पूर्ण बातचीत कर निर्णय लीजिये या फिर अपनी अपील बन्द कर दीजिये । कृपा करके उपरोक्त दो मार्गो मेँ से किसी एक का अनुसरण कीजिये । अगर आप उनकी सहायता नहीँ कर सकते तो कृपा करके उन पर रहम कीजिये और उन्हेँ अकेला छोड दीजिये । वे अपनी रक्षा आप कर लेगे ।
आशा है आप अपरोक्त प्रार्थना पर कृपया विचार करेँगे और अपनी राय सर्व साधारण के सामने प्रकट कर देगे ।
आपका
अनेकोँ मेँ से एक
भगतसिँह व उनके साथियोँ को मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश आक्रोषित था व गांधीजी की ओर इस आशा से देख रहा था कि वह अनशन कर इन देशभक्तोँ को मृत्यु से बचाएगे । राष्ट्रवादियोँ ने गांधीजी से राजगुरू , सुखदेव और भगतसिँह के पक्ष मेँ हस्तक्षेप कर ब्रिटिस सरकार से उनकी फाँसी माफ कराने की प्रार्थना की । परन्तु जनता की प्रार्थना को गांधीजी ने इस तर्क के साथ ठुकरा दिया कि मैँ हिँसा का पक्ष नहीँ ले सकता । जब प्रथम विश्वयुद्ध ( 1914 - 1918 ) के दौरान भारतीय सैनिकोँ ने हजारोँ जर्मनोँ को मौत के घाट उतारा तो क्या गांधीजी ने हिँसा का पक्ष नहीँ लाया था ? परन्तु शायद वह हिँसा इसलिए नहीँ थी , क्योँकि वे सैनिक अंग्रेजोँ की सेना मेँ जर्मनोँ को मारने के लिए उन्होँने भर्ती कराये थे । विश्वयुद्ध के दौरान गांधीजी ने वायसराय चेम्स फोर्ड को एक पत्र भी लिखा था । पत्र मेँ उन्होँने लिखा था - " मैँ इस निर्णायक क्षण पर भारत द्वारा उसके शारीरिक रूप से स्वस्थ पुत्रोँ को अंग्रेजी साम्राज्य पर बलिदान होने के रूप मेँ प्रस्तुत किये जाने के लिए कहूँगा । "
प्रथम विश्वयुद्ध मेँ उन्हेँ ब्रिटिस साम्राज्य के प्रति उनकी सेवाओँ के लिए 'केसर-ए-हिन्द' स्वर्ण पदक से अलंकृत किया गया था ।
अगर गांधी जी हस्तक्षेप करते तो भगतसिंह और उसके साथियों को बचाया जा सकता था , क्योंकि ब्रिटिस सरकार ने ऐसे संकेत दिये थे । गांधी जी जानते थे कि वायसराय के पास फाँसी की सजा माफ करने के पूरे अधिकार हैं । लेकिन उनकी तरफ से इस बारे में कोई गंभीर प्रयास नहीं हुए ।
लार्ड इरविन ने अपनी डायरी में लिखा था कि ' दिल्ली में जो समझौता हुआ उससे अलग और अंत में मिस्टर गांधी ने भगत सिंह का उल्लेख किया था , पर उनकी फाँसी की सजा रदद करने के लिए कोई पैरवी नहीं की । ' इस सन्दर्भ में गांधी जी के करीबी और उनके अनन्य भक्त डॉ. पट्टाभि सीतारमैय्या ने लिखा हैं , ' समझौते की बातचीत के दौरान भगत सिंह और उनके साथी राजगुरू व सुखदेव की फाँसी की सजा को अन्य सजा के रूप में परिवर्तित कर देने के बारे में गांधी जी और वाइसराय के बीच बार - बार लम्बी बातें हुई । इस संदर्भ में वायसराय ने इतना ही आश्वासन दिया कि मार्च , 1931 की अंतिम तिथियों में कराची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन तक इन्हें फाँसी नहीं दी जाएगी । ' गांधी जी ने वायसराय से कहा , ' अगर इन नौजवानों को फाँसी पर लटकाना ही हैं तो कांग्रेस अधिवेशन के बाद ऐसा करने के बजाय उससे पहले ठीक होगा । इससे लोगों के दिलों में झूठी आशाएं नहीं बंधेगी । '
वायसराय भी मान गया । वह भी इस मुसीबत से जल्द से जल्द छुटकारा पाना चाहता था । अंततः कराची - कांग्रेस अधिवेशन से पूर्व राजगुरू , सुखदेव और भगतसिंह को नियम भंग कर 24 मार्च 1931 को प्रातःकाल दी जाने वाली फाँसी 23 मार्च को शाम में ही दे दी गई । अंग्रेजों ने निमर्मता की सभी हदे पार करते हुए उनके शवों के टुकडे - टुकडे करें और उन्हें चुपचाप लाहौर से पचास मील दूर ले जाकर फिरोजपुर के समीप सतलुज नदी के किनारे जला डाला । सारा देश इस अन्याय के विरूद्ध उठ खडा हुआ , लेकिन गांधी जी शान्त रहें ।
इसके बाद कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने गांधी जी कराची पहुंचे तो नौजवानों ने उन्हें काले कपडे से बने फूल और वह राख भेट की जो इन तीन वीर शहीदों की लाशों को जलाने के बाद बची रह गयी थी । नौजवान नारे लगा रहे थे - गांधीवाद का नाश हो , गांधी वापस जाओ ।
भगत सिंह की फाँसी पर आये कुछ प्रसिद्ध वक्तव्य -
' मैने भगतसिंह को कई बार लाहौर में एक विद्यार्थी के रूप में देखा । मैं उसकी विशेषता को शब्दों में बयां नही कर सकता । उसकी देशभक्ति और भारत के लिए उसका अगाध प्रेम अतुलनीय हैं । लेकिन इसने अपने असाधारण साहस का दुरूपयोग किया । मैं भगत सिंह और उसके साथी देशभक्तों को पूरा सम्मान देता हूँ । साथ ही देश के युवाओं को आगाह करता हूँ कि वे इसके मार्ग पर न चले । ( मोहनदास कर्मचन्द गांधी )
जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फाँसी पर लटकाने की सलाह दी , वह देश का गद्दार और शैतान था । ( पंजाब केसरी )
यह काफी दुखद और आश्चर्यजनक हैं कि भगतसिंह और उसके साथियों को एक दिन पूर्व ही फाँसी दे दी गई , 24 मार्च को कलकत्ता से कराची जाते हुए रास्ते में यह दुखद समाचार मिला । भगतसिंह युवाओं में नई जागरूकता का प्रतिक बन गया हैं । ( सुभाष चन्द्र बोस )
अंग्रेजी कानून के अनुसार भगत सिंह को साडर्स हत्याकाण्ड में दोषी नहीं ठहराया जा सकता था । फिर भी उसे फाँसी दे दे गई । ( सरदार वल्लभ भाई पटेल )
भगत सिंह ऐसे किसी अपराध का आरोपी नहीं था जिसके लिए उसे फाँसी दी जाती । हम इस घटना की कडी निन्दा करते हैं । ( डी. वी. रंगाचरियार )
गांधी जी की जरा भी इच्छा नहीं थी कि कराची के कांग्रेस अधिवेशन में शहीद भगत सिंह और उनके साथियों के बलिदान के प्रति कोई सम्मान जताया जाये । वह नहीं चाहते थे कि कांग्रेस इन शहीदों के समर्थन में कोई प्रस्ताव पास करें । लेकिन दबाव इतना अधिक था कि कांग्रेस को इन वीर शहीदों के पक्ष में प्रस्ताव पास करना पडा । जहां तक समझौते की बात थी इरविन - गांधी समझौता एक मजाक बनकर रह गया था । जिन शर्तो को लेकर गांधी जी ने समझौता किया था उनमें से एक भी शर्त लार्ड इरविन ने पूरी तरह नहीं मानी थी ।
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

क्या गांधी जी राष्ट्रपिता हैँ ?


गांधी जी के कट्टर भक्त, भारत की केन्द्रिय सरकार और कुछ हमारे अपने भारतवासी जो भारत की संस्कृति और इतिहास से अनभिज्ञ हैँ गांधी जी को राष्ट्रपिता कहते हैँ । गांधी जी भी अपने आपकोँ राष्ट्रपिता कहलाने मेँ गर्व का अनुभव करते थे । भारत एक सनातन राष्ट्र हैँ और यहाँ की संस्कृति अरबोँ वर्ष पुरानी हैँ । इससे पुराना राष्ट्र विश्व मेँ कोई दूसरा नहीँ हैँ, तो फिर इसका पिता अट्ठारहवीँ - उन्नीसवीँ ईसाई सदी मेँ कैसे पैदा हो सकता हैँ ! यह महान आश्चर्य की बात है कि अरबोँ वर्षो से यह राष्ट्र बिना पिता के कैसे चल रहा था ?
राष्ट्रपिता की अवधारणा पाश्चात्य मैकालेवाद की देन हैँ । भारत की संस्कृति तो पृथ्वी को, जन्म भूमि को माता के रूप मेँ देखती हैँ और अपने आपकोँ उसका पुत्र मानती हैँ । यदि हम पाश्चात्य अवधारणा पर ही विचार करेँ, तो जो अन्न, विद्या और सुशिक्षा आदि का दान देकर पालन - पोषण और रक्षण करता हैँ, वहीँ पिता कहलाता हैँ । तो क्या गांधी जी ने शास्त्र की आज्ञानुसार इस राष्ट्र का पोषण और रक्षण किया था जो वह राष्ट्रपिता हुये ? जबकि वास्तव मेँ गांधी जी एक ऐसे अहिँसक मसीहा थे जिन्होँने अपने निजी स्वार्थ के लिये स्वतंत्र अखण्ड भारत के उपासक सच्चे देशभक्तोँ को नष्ट कराया और बाद मेँ भारत माता को भी टुकडोँ मेँ विभाजित करा दिया । यदि गांधी जी चाहते तो पाकिस्तान नहीँ बनता ।
गांधी जी इस राष्ट्र के पिता हैँ, तो यह राष्ट्र उनका पुत्र हुआ और जो अपने पुत्र के टुकडे करा देँ, वह पुत्र का रक्षक हुआ या भक्षक ? वास्तव मेँ गांधी जी इस राष्ट्र के पिता तो क्या पुत्र कहलाने के लायक भी नहीँ थे, क्योँकि पुत्र वह होता हैँ जो अपने पिता को दुर्गति से बचाता हैँ । आधुनिक भारत राष्ट्र की दुर्गति करने वाले ही सिर्फ गांधी जी थे, इसलिए वे इस राष्ट्र के पिता तो क्या, पुत्र भी कहलाने के अधिकारी नहीँ हैँ ।
* मैं जानता हूँ कि करोड़ों भारतवासी जो गांधी जी में आस्था रखते है मेरे इस एक लेख से मेरे विरूद्ध हो जायेगे , मुझे उनके आक्रोश का शिकार भी होना पड सकता है , पर क्या करूँ , सच को झुठलाने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है । मैं मानता हूँ कि देवता भी गलती कर सकते है तो इसमें गांधी जी या गोडसे जी अपवाद कैसे हो सकते है , थे तो आखिर वे मनुष्य ही ।
इस लेख पर कोई अन्तिम निणर्य देने से पूर्व इसी ब्लॉग पर लिखे निम्नलिखित लेख :-
1. अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा वीर नाथूराम गोडसे भाग - एक , भाग - दो , भाग - तीन
2. वीर महात्मा नाथूराम गोडसे एक नया दृष्टिकोण
3. इरविन - गांधी समझौता और भगतसिंह की फाँसी भाग - एक , भाग - दो
4. क्रान्तिकारी सुखदेव का गांधी जी के नाम खुला पत्र
5. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के प्रति गांधी जी का द्वेषपूर्ण व्यवहार
6. गांधी जी नेहरू की दृष्टि में ?
7. गौहत्या पर प्रतिबंध के खिलाप गांधी - नेहरू परिवार
8. गांधी जी और हिन्दी भाषा
...... भी पढें और फिर अपना निश्पक्ष निर्णय दे कि क्या गांधी जी राष्ट्रपिता है ?
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

रविवार, 6 मार्च 2011

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक नया दृष्टिकोण भाग - तीन


नेताजी सुभाष की कथित मृत्यु की घोषणा के बाद जवाहर लाल नेहरू ने 1956 मेँ शाहनवाज कमेटी तथा इन्दिरा गांधी ने 1970 मेँ खोसला आयोग द्वारा जांच करवाई तथा दोनोँ जांच रिपोर्टो मेँ नेताजी को उस विमान दुर्घटना मेँ मृत घोषित किया गया । लेकिन जिस देश मेँ यह दुर्घटना होने की खबर थी, उस ताइवान देश की सरकार से, इन दोनोँ आयोगोँ ने बात ही नहीँ की । 1978 मेँ मोरारजी देसाई सरकार ने इन रिपोर्टो को रद्द कर दिया । 1999 मेँ अटलबिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व मेँ तीसरा आयोग बनाया गया । 2005 मेँ ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान की भूमि पर कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीँ था । मुखर्जी आयोग ने सोनिया गांधी की यूपीए सरकार को अपनी जांच रिपोर्ट सौप दी, जिस मेँ उन्होँने कहा है कि नेताजी सुभाष की मृत्यु उस विमान दुर्घटना मेँ होने का कोई प्रमाण नहीँ हैँ । लेकिन यूपीए सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया । कांग्रेसनीत यूपीए सरकार द्वारा इस रिपोर्ट को रद्द किया जाना वीर महात्मा नाथूराम गोडसे के उस वचन की याद दिलाते हैँ जिसमेँ उन्होँने कहा था कि - ' गांधी व उसके साथी सुभाष को नष्ट करना चाहते थे । '
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का स्वप्न था स्वाधीन, शक्तिशाली और समृद्ध । नेताजी भारत को अखण्ड राष्ट्र के रूप मेँ देखना चाहते थे । लेकिन गांधी - नेहरू की भ्रष्ट साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की नीतियोँ ने देश का विभाजन करके उनके स्वप्न की हत्या कर दी । दो धर्म - दो देश के आधार पर भारत का विभाजन करा दिया गया जो विश्व की सबसे बडी त्रासदी हैँ । कांग्रेस यदि नेताजी की चेतावनी पर समय रहते ध्यान देती और गांधीवाद के पाखण्ड मेँ न फंसी होती तो देश न बटता तथा मानवता के माथे पर भयानक रक्त - पात का कलंक लगने से बच जाता । नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि " आजादी का मतलब सिर्फ राजनीतिक गुलामी से छुटकारा ही नहीं हैं , देश की सम्पत्ति का समान बटवारा , जात-पात के बंधनों और सामाजिक ऊँच-नीच से मुक्ति तथा साम्प्रदायिकता और धर्मांधता को जड से उखाड फेंकना ही सच्ची आजादी होगी । "
आप सभी राष्ट्रवादियोँ से विनम्र निवेदन हैँ कि आप सब भी जाति - धर्म, पार्टी - संगठन आदि के भेद को भूलकर नेताजी के अधूरे स्वप्न को पूरा करने की दिशा मेँ अग्रसर होँ । वास्तव मेँ निस्वार्थ भाव से राष्ट्रहित मेँ अपना सर्वस्य न्यौछावर कर देने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के सच्चे नायकोँ मेँ से एक थेँ ।
जय नेताजी सुभाष
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक नया दृष्टिकोण भाग - दो



उस समय गांधीवादी यही समझते थे कि गांधीजी ने पट्टाभी सीतारमैय्या को अपना पूर्ण समर्थन दिया है इसलिए वह आसानी से चुनाव जीत जाएंगे । लेकिन परिणाम उनकी आशा के ठीक विपरीत आया । सुभाष चन्द्र बोस को चुनाव मेँ 1580 मत मिले जबकि पट्टाभी सीतारमैय्या को 1377 मत मिले । गांधीजी के प्रबल विरोध के बावजूद सुभाष 203 मतोँ से चुनाव जीतकर दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने गये । गांधीजी को दुःख हुआ, उन्होँने कहा कि ' सुभाष की जीत गांधी की हार हैँ । ' गांधी व उनके साथियोँ ने सुभाष को उनके कार्यो मेँ सहयोग करना तो दूर उल्टा उन्हेँ मानसिक रूप से प्रताडित करना शुरू कर दिया । सुभाष ने समझोते की बहुत कौशिश की, लेकिन गांधी व गांधी के सहयोगियोँ ने उनकी एक न मानी । आखिर मेँ परेशान होकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाष बाबू ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया । और 3 मई 1939 मेँ फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी बना ली । सितम्बर 1939 मेँ यूरोप मेँ महायुद्ध छिड गया और फॉरवर्ड ब्लॉक ने नेताजी सुभाष के नेतृत्व मेँ अंग्रेजोँ के विरूद्ध देश भर मेँ प्रदर्शनोँ का आयोजन किया । 1940 मेँ सुमाष को उनके घर मेँ ही नजरबंद कर दिया गया ।
16 जनवरी 1941 को सुभाष ब्रिटिस सरकार के पहरे को तोडकर भेष बदलकर घर से भाग निकले और अखण्ड भारत को अंग्रेजोँ से मुक्त कराने के प्रयास मेँ अफगानिस्तान, रूस होते हुये जर्मनी पहुँच गये । उन्होँने जर्मनी मेँ भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिन्द रेडियोँ की स्थापना की । इसी दौरान सुभाष चन्द्र बोस नेताजी के उपनाम से जाने जाने लगे । 29 मई 1942 को नेताजी एडॉल्फ हिटलर से मिले । हिटलर ने उन्हेँ भारत का उच्च प्रतिनिधि स्वीकार किया और बिना शर्त अपना समर्थन दिया । कुछ वर्ष पूर्ण हिटलर ने ' माईन काम्फ ' नाम से अपना आत्मचरित्र लिखा था जिसमेँ उन्होँने भारत और भारतीय लोगो पर कुछ आपत्तिजनक बाते लिखी थी । नेताजी ने निर्भिक स्वर मेँ हिटलर से अपना विरोध जताया तो हिटलर ने खेद प्रकट किया और अगले संस्करण मेँ भारतीय दृष्टिकोण को बदल देने का वचन दिया ।
13 मई 1943 को नेताजी सुभाष जापान पहुँच गये और वहाँ के प्रधानमन्त्री हिदेकी तोजो से 10 जून 1943 को मुलाकात की । जापान के प्रधानमन्त्री तोजो ने नेताजी सुभाष के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हेँ आजादी की लडाई मेँ सहकार्य करने का आश्वासन दिया । जून 1943 मेँ नेताजी ने टोकियो रेडियोँ से घोषणा की कि ' अंग्रेजोँ से यह आशा करना व्यर्थ हैँ कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड देगे, हमेँ स्वयं भारत के भीतर व बाहर से भी स्वतंत्रता के लिये संघर्ष करना होगा ।
4 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाष ने महान प्रवासी क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस से आजाद हिन्द फौज का दायित्व ग्रहण किया । 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष ने सिंगापुर मेँ स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार की स्थापना की । कुछ ही दिनोँ मेँ विश्व के नौ देशोँ जापान, जर्मनी, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, बर्मा, थाईलैण्ड और आयरलैण्ड ने ' आजाद हिन्द सरकार ' को मान्यता दे दी । जापान ने अंडमान तथा निकोबार द्वीप इस अस्थाई सरकार को दे दिये । नेताजी ने अंडमान का शहीद द्वीप और निकोबार का स्वाराज्य द्वीप नामाकरण करके 30 दिसम्बर 1943 को वहाँ स्वतंत्र भारत का ध्वज फैरा दिया ।
4 फरवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने नेताजी के नेतृत्व मेँ जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिस सेना पर भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय क्षेत्रोँ को अंग्रेजोँ से मुक्त करा लिया । 22 सितम्बर 1944 को नेताजी सुभाष ने रंगून के जुबली हॉल मेँ अपने भाषण मेँ राष्ट्रभक्तोँ का आह्वान करते हुये कहा था कि - ' हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज मेँ हैँ, तुम मुझे खून दोँ, मैँ तुम्हेँ आजादी दूंगा, यह स्वातंत्र्य देवी की मांग हैँ । ' किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध मेँ आगे जाकर अंग्रेजोँ का पलडा भारी पडा और दोनो सेनाओँ को पीछे हटना पडा । ऐसे समय मेँ गांधीजी ने जिनके हाथ मेँ उस समय करोडोँ भारतीयोँ की नब्ज थी और जिनसे आजाद हिन्द फौज को काफी मदद मिल सकती थी सुभाष की सहायता के लिए कुछ नहीँ किया बल्कि गांधी के प्रिय जवाहर लाल नेहरू ने 24 अप्रैल 1945 को गुवाहाटी की एक जनसभा मेँ कहा कि - ' यदि सुभाष चन्द्र बोस ने जापान की सहायता से भारत पर हमला किया तो मैँ स्वयं तलवार उठाकर सुभाष से लडकर रोकने जाऊँगा । '
द्वितीय विश्वयुद्ध मेँ जापान और जर्मनी की हार और भारत मेँ क्रान्तिकारियोँ के प्रति गांधी के नकारात्मक दृष्टिकोण को देखते हुये सुभाष ने अखण्ड भारत की आजादी के लिये रूस से सहायता मांगने का निश्चय किया । 18 अगस्त 1945 को नेताजी ने हवाई जहाज से मांचुरिया के लिए उडान भरी । इस उडान के बाद से नेताजी का कुछ भी प्रमाणित पता नहीँ हैँ ।
23 अगस्त 1945 को जापान की दोमेई समाचार संस्था ने तथाकथित विमान दुर्घटना मेँ नेताजी सुभाष की मृत्यु का समाचार प्रसारित किया । जिस पर स्वभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि नेताजी सुभाष यदि 18 अगस्त 1945 को मर चुके थे तो उन्हेँ 1999 तक राष्ट्र संघ का युद्ध अपराधी घोषित क्योँ किया गया ?
क्रमश ......
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

शनिवार, 5 मार्च 2011

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक नया दृष्टिकोण भाग - एक


23 जनवरी 1897 को कटक के प्रसिद्ध अधिवक्ता जानकीनाथ बोस के घर जन्मेँ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस बाल्यकाल से ही निर्भय, बलवान एवं साहसी थे । इनकी माता प्रभावती एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी । अंग्रेजी प्रबंधकोँ द्वारा भारतीयोँ पर किये जा रहे अत्याचारोँ ने तथा धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द के भाषणोँ एवं लेखोँ ने उनके अंतर्मन पर गहरा प्रभाव डाला, अल्प आयु मेँ ही उन्होँने ग्राम सुधार के क्रान्तिकारी कार्यो मेँ भाग लेना शुरू कर दिया । सुभाष ने 1913 मेँ मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की । 1919 मेँ कोलकात्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की । 15 सितम्बर 1919 को सुभाष इंग्लैँड गये और कैंब्रिज विश्वविद्यालय मेँ प्रवेश ले लिया । आई. सी. एस. की परीक्षा पास कर लेने पर अंग्रेजी सरकार ने उन्हेँ लन्दन मेँ ही नौकरी दे दी । लेकिन सुभाष ने भारत की जनता पर अंग्रेजी सरकार द्वारा किये जा रहे अत्याचारोँ को देखते हुये अंग्रेजोँ की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और 16 जुलाई 1921 को भारत वापस लौटकर मातृभूमि को आजाद करवाने के कार्य मेँ जुट गये । 20 जुलाई 1921 को उन्होँने गांधीजी से मुलाकात की और अपना समर्थन दिया । सुभाष अपने भारत प्रवास के दौरान ग्यारह बार अंग्रेजोँ की कैद मेँ रहें । आजाद हिन्द फौज के पुर्नसंस्थापक एवं आजाद हिन्द सरकार के पुरोधा नेताजी सुभाष ने रंगून के जुबली हॉल मेँ अपने भाषण मेँ राष्ट्रभक्तोँ का आह्वान करते हुये कहा था कि - ' हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज मेँ हैँ, तुम मुझे खून दोँ, मैँ तुम्हेँ आजादी दूंगा । '
राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति सुभाष को प्रेरित करने मेँ चितरंजन दास का विशेष योगदान था । 1922 मेँ सुभाष कलकत्ता महानगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चुने गये । सुभाष ने अपने कार्यकाल के दौरान कोलकात्ता महापालिका का पूरा तंत्र और कार्यपद्धति को ही बदल डाला । कोलकात्ता के रास्तोँ के नाम बदलकर, उन्हेँ भारतीय नाम दिये गये । स्वतंत्रता संग्राम मेँ प्राण न्योछावर करने वालोँ के परिवार के सदस्योँ को नौकरी दी जाने लगी । बहुत ही कम समय मेँ सुभाष देश के एक महत्वपूर्ण शक्तिशाली युवा नेता बन गये । युवा वर्ग के प्रति उनके विचार काफी दृढ थेँ, वे सदैव युवाओँ को अपने आन्दोलन से जोडते रहेँ । जवाहर लाल नेहरू के साथ मिलकर सुभाष चन्द्र बोस ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकोँ की इंडिपेडन्स लिग शुरू की ।
1928 मेँ कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन मेँ सुभाष ने गणवेश धारण करके उस समय के अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी । गांधीजी उन दिनोँ पूर्ण स्वतंत्रता की मांग से सहमत नहीँ थे और इस अधिवेशन मेँ उन्होँने अंग्रेजी सरकार की अपनिवेशी स्वतंत्रता की सन्धि को स्वीकार कराने की ठान ली थी । लेकिन सुभाष को पूर्ण स्वतंत्रता से पिछे हटना स्वीकार न था । सुभाष ने इस सन्धि का विरोध करते हुये कहा कि हम भारत की पूर्ण आजादी से कम कोई भी बात स्वीकार नहीँ करेंगे । हमेँ अधूरी आजादी स्वीकार नहीँ हैँ । हमेँ पूर्ण स्वतंत्रता चाहिये और हम इसे प्राप्त करने के लिये कुछ भी करने को तैयार हैँ ।
26 जनवरी 1931 के दिन कोलकात्ता मेँ सुभाष स्वतंत्रता के उपासकोँ के एक विशाल मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे, जिस पर पुलिस ने लाठियाँ चलायी और सुभाष को घायल कर दिया । जब सुभाष जेल मेँ थे तो गांधीजी ने चतुराई पूर्वक क्रान्तिकारियोँ मेँ आपसी फूट डालने के लिये अंग्रेजी सरकार से समझोता किया और सब कांग्रेसी कैदियोँ को रिहा किया गया । लेकिन अंग्रेजी सरकार ने भगतसिंह जैसे प्रखर राष्ट्रभक्त क्रान्तिकारियोँ को रिहा करने से इन्कार कर दिया । भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव की फांसी माफ कराने के लिये गांधीजी ने अंग्रेजी सरकार से बात तो की लेकिन उन्हेँ बचाने के लिये कोई दृढ इच्छाशक्ति प्रकट नहीँ की । सुभाष चाहते थे कि इस मुद्दे पर गांधीजी अंग्रेजी सरकार के साथ किया गया समझोता तौड देँ । लेकिन गांधीजी अंग्रेजी सरकार के साथ किया गया समझोता तौडने को तैयार न हुये । अन्त मेँ भगतसिंह और उनके साथियोँ को नियम विरूद्ध 24 मार्च 1931 को प्रातःकाल दी जाने वाली फाँसी 23 मार्च को शाम मेँ ही दे दी गई, सारा देश इस अन्याय के खिलाप उठ खडा हुआ, लेकिन गांधीजी शान्त रहेँ । भगतसिंह को न बचा पाने के कारण सुभाष तथा अन्य राष्ट्रवादी युवा गांधीजी की नीतियोँ के विरोधी हो गये ।
नेताजी सुभाष मेँ नेतृत्व के सभी गुण विद्यमान थे । प्रखर देशभक्ति, त्याग की भावना, कार्य निष्पादित करने की लगन, दार्शनिकता और दूरदर्शी सोच । अतः 1938 मेँ सुभाष को कांग्रेस के 51 वेँ अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया । अपने अध्यक्ष पद के कार्यकाल मेँ सुभाष ने योजना आयोग की स्थापना की और जवाहर लाल नेहरू को इसका अध्यक्ष बनाया । इसी दौरान यूरोप मेँ द्वितीय विश्व युद्ध के बादल छा गए । सुभाष चाहते थे कि इंग्लैँड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर भारत की आजादी की लडाई को ओर तेज किया जाये । यह भारत की आजादी के लिए स्वर्णिम अवसर है । लेकिन गांधीजी को उनके स्वतंत्रता के हेतुक कार्यकलाप पसंद नहीँ आये और वह उनके विचारोँ से सहमत नहीँ हुये ।
1939 मेँ जब कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुनने का समय आया तो सुभाष चाहते थे कि कोई ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बनाया जाये जो अखण्ड भारत की पूर्ण आजादी के विषय पर किसी के दबाव के सामने न झुके । ऐसा कोई व्यक्ति सामने न आने पर सुभाष ने स्वयं अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहा । लेकिन गांधीजी जिस बात को अपने अनुकूल नहीँ पाते थे उसे दबा देते थे । सुभाष कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहते हुए गांधी की नीतियोँ पर नहीँ चले अतः गांधीजी व उनके साथी सुभाष को अपने रास्ते से हटाना चाहते थे । गांधीजी ने सुभाष के खिलाप पट्टाभी सीतारमैय्या को चुनाव लडाया । किन्तु उस समय गांधी से कही ज्यादा लोग सुभाष को चाहते थे । उस समय सिर्फ सुभाष ही थे जिन्होँने लोगो के दिलोँ पर राज किया था ।
क्रमश ......
विश्वजीत सिंह 'अनंत'

रविवार, 23 जनवरी 2011

युवाओँ के प्रेरणा स्रोत धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द भाग - दो


1897 मेँ भारत वापस आकर स्वामी विवेकानन्द ने भारतीयोँ को हजारोँ वर्षो के आलस्य को छोडकर नए आत्मविश्वास के साथ भारत को विश्व गुरू बनाने के लिए उठ खडे होने तथा समाज के वंचित वर्गो व स्त्रियोँ को शिक्षित करने और विद्या एवं स्वालम्बन द्वारा उनके उत्थान के माध्यम से देश का उत्थान करने का संदेश दिया । स्वामी विवेकानन्द ने स्वदेश मन्त्र देते हुए कहा -
हे भारत ! तुम यह मत भूलना कि तुम्हारी स्त्रियोँ का आदर्श सीता, सावित्री, दमयन्ती है , मत भूलना कि तुम्हारे उपास्य सर्वत्यागी उमानाथ शंकर है, मत भूलना कि तुम्हारा विवाह, धन और जीवन, इन्द्रिय - सुख के लिये, अपने व्यक्तिगत सुख के लिये नहीँ है, मत भूलना कि तुम जन्म से ही ' माता ' के लिये बलिस्वरूप रखे गये गए हो, तुम मत भूलना कि तुम्हारा समाज उस विराट महामाया की छाया मात्र हैँ, मत भूलना कि नीच, अज्ञानी, दरिद्र, चमार और मेहतर तुम्हारे रक्त हैँ, तुम्हारे भाई हैँ । हे वीर ! साहस का आश्रय लो । गर्व से कहो कि मैँ भारतवासी हूँ और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्रह्मण भारतवासी, चाण्डाल भारतवासी - सब मेरे भाई हैँ । भारतवासी मेरे प्राण हैँ, भारत की देव - देवियाँ मेरे ईश्वर हैँ, भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, जवानी की फुलवारी और बुढापे की काशी है । भाई, बोलो कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग हैँ, भारत के कल्याण से मेरा कल्याण हैँ, और रात - दिन कहते रहोँ - हे गौरीनाथ ! हे जगदम्बे ! मुझे मनुष्यत्व दो, माँ ! मेरी दुर्बलता और कापुरूषता दूर कर दो । माँ मुझे मनुष्य बना दो ।
स्वामी विवेकानन्द ने अपने कार्य को दृढ आधार प्रदान करने के लिए 1 मई 1897 को कलकत्ता मेँ ' रामकृष्ण मिशन ' और 9 दिसम्बर 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर मेँ ' रामकृष्ण मठ ' की स्थापना की । निवेदिता गर्ल्स स्कूल की स्थापना की गई तथा अनेक पत्रोँ का प्रकाशन एवं साहित्य का सृजन किया गया । उनके अंग्रेज शिष्य कैप्टेन सर्वियर तथा श्रीमती सर्वियर द्वारा स्वामी विवेकानन्द की इच्छानुसार मायावती ( अल्मोडा ) मेँ ' अद्वैत आश्रम ' की स्थापना की गई । स्वामीजी के अनुयायी उनके निर्देशानुसार ' नर सेवा, नारायण सेवा ' के काम मेँ लग गये ।
4 जुलाई 1902 को बेलूर के रामकृष्ण मठ मेँ उन्होँने ध्यान की अवस्था मेँ महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिये । उनका पार्थिव शरीर चला गया, किन्तु अपनी चिर, अमरता का संदेश देने के लिए उनके वे शब्द स्थाई एवं चिर व्याप्त है जो उन्होँने मिस्टर एरिक हैमंड को लन्दन मेँ कहे थे, - ' सम्भवतः यह अच्छा होगा कि मैँ अपने इस शरीर के बाहर निकल आऊं और इसे जीर्ण वस्त्र की भांति उतार फेकूं, किन्तु फिर भी मैँ कार्य करने से रूकूंगा नहीँ । मानव समाज मेँ मैँ तब तक सर्वत्र प्रेरणा प्रदान करता रहूंगा जब तक कि संसार यह भाव आत्मसात न कर लेँ कि वह ईश्वर के साथ एक है । '
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, कवि रविन्द्रनाथ टैगोर और महर्षि अरविन्द घोष जैसे महान व्यक्तियोँ ने धर्मयोद्धा स्वामी विवेकानन्द को भारत की आत्मा को जाग्रत करने वाला और राष्ट्रवाद के युगनायक के रूप मेँ देखा । भारत सरकार ने भी उनके सम्मान मेँ उनके जन्मदिन 12 जनवरी को ' राष्ट्रीय युवा दिवस ' के नाम से घोषित किया है । स्वामी विवेकानन्द के कुछ अमर संदेश प्रस्तुत है -
* " उतिष्ठित, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत् " - उठो, जागो और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये ।
* ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्धि कर सकता है । सभी जीवन्त ईश्वर है - इस भाव से सबको देखोँ । मनुष्य का अध्ययन करोँ, मनुष्य ही जीवन काव्य है । जगत मेँ जितने ईसा या बुद्ध हुये हैँ, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्यमान है । इस ज्योति को छोड देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीँ रह सकेँगे, मर जायेँगे । तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहोँ ।
* जिसका जो जी चाहे कहे, अपने आप मेँ मस्त रहोँ- दुनियां तुम्हारे पैरोँ तले आ जाएगी, चिन्ता मत करोँ । लोग कहते है - इस पर विश्वास करोँ, उस पर विश्वास करोँ, मैँ कहता हूँ - अपने आप पर विश्वास करोँ । अपने पर विश्वास करोँ - सब शक्ति तुम मेँ है, इसको धारण करोँ और शक्ति जगाओँ - कहो हम कुछ भी कर सकते हैँ ।
* हे मेरे युवक बन्धुगण ! बलवान बनोँ - यहीँ तुम्हारे लिए मेरा उपदेश है । गीता पाठ करने की अपेक्षा फुटबॉल खेलने से तुम स्वर्ग के अधिक नजदीक पहुंचोगे । मैने अत्यन्त साहसपूर्वक ये बाते कही है और इनकोँ कहना अत्यावश्यक हैँ, कारण मैँ तुमको प्यार करता हूँ । मैँ जानता हूँ कि कांटा कहाँ चुभता हैँ । मैँने कुछ अनुभव किया है । बलवान शरीर से और मजबूत पुट्ठोँ से तुम गीता को अधिक समझ सकोगे ।
* मन का विकास करो और उसका संयम करोँ, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो - उससे अतिशीघ्र फल प्राप्ति होगी । यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय । एकाग्रता सीखो और जिस और इच्छा हो, उसका प्रयोग करो । ऐसा करने पर तुम्हे कुछ खोना नहीँ पडेगा ।
* वीरता के साथ आगे बढो । एक दिन या एक वर्ष मे सिद्धी की आशा न रखो । उच्चतम आर्दश पर दृढ रहो । स्थिर रहो । स्वार्थपरता और ईष्या से बचो । आज्ञा-पालन करो । सत्य, मनुष्य-जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे । याद रखो व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय कुछ भी नही ।
* संसार का इतिहास उन थोडे से व्यक्तियोँ का इतिहास है जिनमेँ आत्मविश्वास था । विश्वास-विश्वास ! अपने आप पर विश्वास, परमात्मा पर विश्वास - यही उन्नति करने का एकमात्र उपाय है । यदि पुराणो के तेँतीस करोड देवताओँ के ऊपर और विदेशियो ने बीच - बीच मे जिन देवताओँ को तुम्हारे बीच मे घुसा दिया है, उन सब पर तुम्हारा विश्वास हो और अपने आप पर विश्वास न हो, तो तुम कदापि मोक्ष के अधिकारी नही हो सकते ।
विश्वजीत सिंह 'अनंत'